जिला परिषद की लड़ाई, अब प्रतिष्ठा पर बन आई




 पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों में जिला परिषद की सरदारी को लेकर भाजपा और कांग्रेस में इस मर्तबा कड़ी टक्कर रहेगी। हालांकि कांग्रेस ने पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों में अधिकृत प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारे हैं, लेकिन विधायक और स्थानीय नेता इन चुनावों पर गंभीरता दिखा रहे हंै और प्रदेश में जिला परिषद पर कांग्रेस का दबदबा बनाने के लिए मैदान में जुट गए हैं। जिला परिषदों पर कब्जे को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच इस बार सीधी प्रतिष्ठा की लड़ाई बनने जा रही है। जानकारी के अनुसार पिछले कार्यकाल में 12 में से नौ जिला परिषद अध्यक्ष पदों पर भाजपा समर्थित उम्मीदवारों का कब्जा रहा था। ऐसे में भाजपा को अपना मजबूत गढ़ बचाने की बड़ी चुनौती है। वहीं, सत्ता में बैठी कांग्रेस ग्रामीण राजनीति में सेंध लगाकर नया सियासी समीकरण खड़ा करने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री सुक्खू के कार्यकाल में पहली बार पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव हो रहे हैं। इस लिहाज से जिला परिषद के नतीजों को कहीं न कहीं सरकार के प्रदर्शन और जनाधार से जोडक़र भी देखा जाएगा।




कांग्रेस यदि जिला परिषदों में बढ़त बनाती है, तो इसे सरकार के पक्ष में जनसमर्थन माना जाएगा। पंचायत चुनाव अब विधायकों और मंत्रियों की प्रतिष्ठा से भी जुड़े माने जा रहे हैं। ऐसे में जिला परिषद के नतीजों के बाद सभी जिला में परिषद के अध्यक्ष पद को लेकर दोनों सियासी दलों की राजनीतिक पकड़ की भी इन चुनावों में परीक्षा होगी। जाहिर है कि कांग्रेस पहले ही साफ कर चुकी है कि पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव में पार्टी सीधे तौर पर अधिकृत प्रत्याशी घोषित नहीं करेगी और प्रत्याशी चयन में संगठन का औपचारिक हस्तक्षेप भी नहीं होगा। हालांकि स्थानीय विधायक और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अपने-अपने क्षेत्रों में तालमेल बैठाकर पार्टी विचारधारा से जुड़े उम्मीदवारों की पैरवी कर रहे हैं। संगठन में प्रदेश स्तर पर जिम्मेदारी संभाल रहे नेता भी लगातार कार्यकर्ताओं से कांग्रेस समर्थित विचारधारा वाले उम्मीदवारों के समर्थन की अपील कर रहे हैं। उधर, भाजपा पंचायत चुनावों में अपने पुराने संगठनात्मक नेटवर्क और बूथ स्तर की पकड़ के भरोसे मैदान में उतर रही है। पिछले कार्यकाल में जिला परिषदों में पार्टी का दबदबा रहा है और भाजपा इसी बढ़त को बनाए रखने के लिए रणनीति तैयार कर रही है। पार्टी नेताओं का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा की जमीनी पकड़ अब भी मजबूत है और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत बनेगी।




पंचायत चुनावों का असर


पंचायतीराज चुनाव सीधे पार्टी चिन्ह पर नहीं लड़े जाते, लेकिन असली राजनीतिक तस्वीर चुनाव परिणाम आने के बाद सामने आती है। उम्मीदवार निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ते हैं, मगर जिला परिषद अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव के दौरान उनके राजनीतिक झुकाव खुलकर सामने आ ही जाते हैं। यही वजह है कि चुनाव परिणाम के बाद जोड़-तोड़, रणनीति और राजनीतिक समीकरणों का दौर तेज हो जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंचायत चुनावों में संगठन की असली ताकत सामने आती है। पंचायत चुनावों में स्थानीय समीकरण, व्यक्तिगत संपर्क और क्षेत्रीय प्रभाव निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

जिला परिषद की लड़ाई, अब प्रतिष्ठा पर बन आई जिला परिषद की लड़ाई, अब प्रतिष्ठा पर बन आई Reviewed by SBR on May 12, 2026 Rating: 5

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