शिमला। फर्जी फोन कॉल या मैसेज ही नहीं, अब ठगी के लिए आपकी अपनी आवाज और चेहरा ही आपके खिलाफ इस्तेमाल हो सकता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और डीपफेक तकनीक के दौर में साइबर अपराधियों ने ठगी के तरीकों को पहले से कहीं अधिक हाईटेक और खतरनाक बना दिया है।
महज कुछ सेकंड के ऑडियो या एक फोटो के आधार पर नकली सामग्री बनाई जा रही है। ठग इससे लोगों का भरोसा जीतकर उन्हें अपने जाल में फंसा रहे हैं। हिमाचल पुलिस विभिन्न माध्यमों से आम जनता को इन नए डिजिटल हथियारों के प्रति जागरूक कर रही है।
ठगी की शुरुआत अक्सर सोशल मीडिया से पीड़ित की निजी जानकारी जुटाने से होती है। इसके बाद अपराधी बैंक अधिकारी, पुलिसकर्मी, रिश्तेदार या कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी बनकर संपर्क साधते हैं। बातचीत के दौरान डर या लालच पैदा किया जाता है, ताकि व्यक्ति तुरंत पैसे ट्रांसफर कर दे।
एआई वॉयस क्लोनिंग तकनीक से किसी की आवाज की नकल करना अब बेहद आसान हो गया है। ठग आपात स्थिति का बहाना बनाकर परिवार के सदस्य की आवाज में फोन करते हैं और पैसे की मांग करते हैं। डीपफेक वीडियो के जरिए परिचित या नामचीन हस्ती का नकली वीडियो बनाकर फर्जी निवेश या योजनाओं में फंसाया जा रहा है।
फर्जी लिंक पर क्लिक करते ही यूजर नकली वेबसाइट पर पहुंच जाता है, जहां लॉगिन डिटेल्स, कार्ड नंबर और ओटीपी डालते ही खाता खाली कर दिया जाता है। फर्जी ट्रेडिंग ऐप पर शुरू में छोटे मुनाफे का लालच देकर बाद में बड़ी रकम हड़प ली जाती है।
पुलिस की अपील
प्रदेश पुलिस ने कहा है कि डिजिटल ठगी से बचने के लिए सतर्कता सबसे बड़ा हथियार है। किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक न करें और न ही अपना ओटीपी या यूपीआई पिन किसी के साथ साझा करें। यदि कोई परिचित अचानक पैसे की मांग करे तो केवल आवाज सुनकर भरोसा न करें। दूसरे माध्यम से पहचान की पुष्टि जरूर करें।
किसी भी साइबर ठगी की स्थिति में तुरंत हेल्पलाइन नंबर 1930 पर संपर्क करें या आधिकारिक पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराएं।
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