Editorial: नशे के कारोबार में छात्रों और महिलाओं का इस्तेमाल, समाज के लिए गंभीर चेतावनी
लेखक: अमित कुमार
नशे का कारोबार अब केवल अपराधियों और बड़े तस्करों तक सीमित नहीं रह गया है। इसकी सबसे चिंताजनक तस्वीर तब सामने आती है, जब इस अवैध नेटवर्क में छात्रों और महिलाओं को भी मोहरा बनाया जाने लगे। हाल के मामलों से यह संकेत मिलता है कि तस्कर पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की नजर से बचने के लिए ऐसे लोगों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिन पर सामान्य परिस्थितियों में कम संदेह किया जाता है।
यह स्थिति केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ी के भविष्य से जुड़ा गंभीर सामाजिक संकट है। किसी छात्र का पढ़ाई और करियर बनाने की उम्र में नशे के कारोबार से जुड़ जाना उसके पूरे जीवन को प्रभावित कर सकता है। शुरुआत में आर्थिक लाभ का लालच या किसी परिचित के दबाव में उठाया गया एक छोटा कदम आगे चलकर अपराध और नशे के बड़े जाल में बदल सकता है।
मूल रिपोर्ट में 2026 के दौरान हैदराबाद, कर्नाटक, तेलंगाना और पंजाब सहित कई स्थानों पर छात्रों तथा महिलाओं से जुड़े नशा तस्करी के मामलों का उल्लेख किया गया है। तेलंगाना में शुरुआती पांच महीनों में 204 छात्रों के नशा तस्करी और बिक्री से जुड़े मामलों में पकड़े जाने का आंकड़ा विशेष रूप से चिंता पैदा करता है।
आर्थिक मजबूरी को अपराधी नेटवर्क हथियार बना रहे हैं
गरीब या आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की महिलाएं और रोजगार की तलाश में रहने वाले युवा तस्करों के आसान निशाने बन सकते हैं। कुछ मामलों में उन्हें मामूली रकम के बदले सामान पहुंचाने का काम दिया जाता है, जबकि उन्हें यह भी पूरी तरह पता नहीं होता कि वे किस अवैध नेटवर्क का हिस्सा बन चुके हैं।
यही वह जगह है जहां सरकार और समाज दोनों को अपनी भूमिका समझनी होगी। केवल गिरफ्तारी कर लेना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। तस्करी के पीछे मौजूद नेटवर्क, फंडिंग, स्थानीय संपर्क और युवाओं को फंसाने वाले लोगों तक पहुंचना ज्यादा जरूरी है।
स्कूल-कॉलेजों को बनाना होगा मजबूत सुरक्षा कवच
शैक्षणिक संस्थानों को नशे के खिलाफ केवल जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। छात्रों के व्यवहार में अचानक बदलाव, आर्थिक गतिविधियों में असामान्य परिवर्तन और संदिग्ध गतिविधियों जैसे संकेतों पर संवेदनशील तरीके से ध्यान दिया जाना चाहिए।
साथ ही, छात्रों को यह समझाना जरूरी है कि आसान पैसे का लालच भविष्य की सबसे बड़ी कीमत वसूल सकता है। सरकार द्वारा शैक्षणिक संस्थानों के आसपास ड्रग-फ्री जोन और जागरूकता-काउंसलिंग जैसे उपायों पर जोर दिया जाना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
सीमा क्षेत्रों में तकनीक और निगरानी जरूरी
पंजाब जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में नशे की तस्करी रोकने के लिए केवल सड़क पर पुलिस की मौजूदगी पर्याप्त नहीं है। ड्रोन के इस्तेमाल, डिजिटल निगरानी, सीसीटीवी नेटवर्क और खुफिया सूचनाओं के बेहतर समन्वय की जरूरत है। साथ ही, सीमा पार से आने वाली खेप को स्थानीय स्तर पर आगे पहुंचाने वाले नेटवर्क को तोड़ना भी उतना ही आवश्यक है।
लेकिन कार्रवाई का फोकस केवल छोटे कैरियरों तक सीमित रहा तो बड़े तस्कर बच निकलेंगे। असली जरूरत उन लोगों तक पहुंचने की है जो युवाओं और महिलाओं को पैसे का लालच देकर इस धंधे में धकेलते हैं।
परिवारों की भूमिका भी अहम
नशे के खिलाफ लड़ाई पुलिस या सरकार अकेले नहीं जीत सकती। माता-पिता को बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना होगा। स्कूल-कॉलेजों में काउंसलिंग को मजबूत करना होगा और युवाओं के लिए खेल, रोजगार, कौशल विकास तथा सकारात्मक गतिविधियों के अवसर बढ़ाने होंगे।
महिलाओं के मामले में भी आर्थिक आत्मनिर्भरता और जागरूकता महत्वपूर्ण है। यदि कोई महिला आर्थिक मजबूरी में अपराधी नेटवर्क का हिस्सा बनने जा रही है, तो समाज और प्रशासन को समय रहते उसके लिए वैकल्पिक सहायता उपलब्ध करानी चाहिए।
कठोर कार्रवाई के साथ बचाव की नीति जरूरी
नशे के कारोबार में शामिल संगठित गिरोहों के खिलाफ कानून का सख्ती से इस्तेमाल होना चाहिए। लेकिन इसके साथ यह भी देखना होगा कि कौन मुख्य अपराधी है और कौन लालच, मजबूरी या धोखे का शिकार बनकर इस नेटवर्क तक पहुंचा है।
हमारा लक्ष्य केवल गिरफ्तारियों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि नशे की सप्लाई चेन को जड़ से खत्म करना होना चाहिए।
आज जरूरत है कि सरकार, पुलिस, शैक्षणिक संस्थान, अभिभावक और समाज मिलकर एक ऐसा सुरक्षा तंत्र तैयार करें, जिसमें कोई तस्कर किसी छात्र या महिला को अपनी ढाल न बना सके। क्योंकि नशे के खिलाफ लड़ाई वास्तव में हमारे युवाओं के भविष्य को बचाने की लड़ाई है।
— अमित कुमार
