प्रदेश का किन्नौर जिला प्राकृतिक सौंदर्य के साथ अपनी अद्वितीय किन्नौरी शॉल के लिए विश्वभर में पहचाना जाता है। यह शॉल सिर्फ ऊन का परिधान नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति, श्रम और अर्थव्यवस्था का ऐसा ताना-बाना है, जिसमें हिमालय की सदियों पुरानी जीवनशैली बुनी हुई है। किन्नौर वह भूमि है, जहां हिंदू और बौद्ध परंपराएं समान रूप से फली-फूली हैं। किन्नौर के एक पवित्र स्थल पर गुरु पद्मसंभव के चरणचिह्न आज भी मौजूद हैं, जिनके चारों ओर मंदिर और भित्ति-चित्र बने हैं। किन्नौरी शॉलों की सबसे बड़ी विशेषता उनके ज्यामितीय डिजाइन और रंगों का प्रतीकात्मक अर्थ है, जो इन्हें भारत की अन्य शॉलों से अलग बनाता है। हरा, नीला, सफेद, पीला और लाल रंगों के जरिए आकृतियों में मिथक, धार्मिक प्रतीक और मध्य एशियाई प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। यही वजह है कि किन्नौरी शॉल को केवल फैशन नहीं, बल्कि पहनने योग्य विरासत कहा जाता है।
आज व्यावसायिक शॉलें फे्रम लूम पर बुनी जाती हैं, जबकि स्थानीय उपयोग के लिए पिट-लूम का प्रयोग होता है। एक किन्नौरी शाल आमतौर पर दो आधे हिस्सों में बुनी जाती है, जिन्हें बाद में बीच से सिलकर जोड़ा जाता है। सामान्य शॉल बनाने को लगभग 45 दिन का समय लगता है। शॉल के ऑल ओवर किन्नौरी वर्क के 6-8 महीने लग जाते हैं। किन्नौरी शॉल की कीमत एक लाख तक हो सकती है। अक्तूबर, 2010 में किन्नौरी शॉल को जीआई टैग मिला। अब किन्नौर के बाहर इसकी नक़ल करने पर दो लाख तक जुर्माना या तीन साल तक की सज़ा का प्रावधान है। भारत से ऊनी शॉलों का निर्यात अमरीका, फ्रांस, जापान, जर्मनी, इटली और इंग्लैंड को होता है।
हिम एमएसएमई फेस्ट में प्रदर्शित होगा
अतिरिक्त मुख्य सचिव (उद्योग) आरडी नजीम कहते हैं कि 3 से 5 जनवरी तक शिमला के रिज पर होने वाले हिम एमएसएमई फेस्ट-2026 के दौरान किन्नौर की शॉल को केवल उत्पाद नहीं, बल्कि हिमालय की सांस्कृतिक और आर्थिक धरोहर के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह आयोजन किन्नौरी शॉल को ग्लोबल लक्जऱी हैंडलूम ब्रांड बनने की राह पर मील पत्थर साबित होगा।
Reviewed by SBR
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January 02, 2026
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