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पश्चिम बंगाल में निपाह वायरस के संदिग्ध मामले, केंद्र ने दिया पूर्ण सहयोग का आश्वासन

January 25, 2026

 


पश्चिम बंगाल में निपाह वायरस के संदिग्ध मामलों की पहचान के बाद केंद्र सरकार ने स्थिति से निपटने के लिए त्वरित और व्यापक कदम उठाए हैं। 11 जनवरी 2026 को कल्याणी स्थित आईसीएमआर के वायरस रिसर्च एंड डायग्नोस्टिक लैबोरेटरी (वीआरडीएल), एम्स कल्याणी में निपाह वायरस के दो संदिग्ध मामलों की पुष्टि हुई है। निपाह वायरस एक गंभीर ज़ूनोटिक बीमारी है, जिसकी मृत्यु दर अधिक होती है और इसके तेज़ी से फैलने की आशंका रहती है। इसे देखते हुए हालात को सर्वोच्च प्राथमिकता पर संभाला जा रहा है।


मामले सामने आते ही केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) के साथ समीक्षा बैठक की और त्वरित तथा समन्वित कार्रवाई सुनिश्चित की। राज्य सरकार को सहयोग देने के लिए केंद्र की ओर से एक राष्ट्रीय संयुक्त प्रकोप प्रतिक्रिया दल तैनात किया गया है। इस टीम में ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एंड पब्लिक हाइजीन, कोलकाता; नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी, पुणे; नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी, चेन्नई; एम्स कल्याणी तथा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के वन्यजीव विभाग के विशेषज्ञ शामिल हैं।


केंद्र सरकार ने निपाह वायरस रोग से संबंधित दिशा-निर्देश राज्य के एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (आईडीएसपी) को साझा किए हैं। साथ ही, नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) में सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकालीन संचालन केंद्र (पीएचईओसी) को सक्रिय कर दिया गया है, ताकि देशभर में प्रतिक्रिया और समन्वय को प्रभावी बनाया जा सके।


केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री श्री जगत प्रकाश नड्डा ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी को पत्र लिखकर केंद्र सरकार की ओर से पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया है। उन्होंने मुख्यमंत्री से टेलीफोन पर भी बातचीत कर राज्य को तकनीकी, लॉजिस्टिक और संचालन स्तर पर हर आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता दोहराई।


केंद्र सरकार की ओर से प्रयोगशाला सहायता, निगरानी को सुदृढ़ करने, रोगियों के उपचार, संक्रमण की रोकथाम एवं नियंत्रण उपायों तथा विशेषज्ञ मार्गदर्शन सहित सभी आवश्यक संसाधन पहले ही जुटा दिए गए हैं। राज्य सरकार को तैनात विशेषज्ञ टीमों के साथ निरंतर समन्वय बनाए रखने, संदिग्ध संपर्कों की गहन पहचान और अन्य रोकथाम उपायों को सख्ती से लागू करने की सलाह दी गई है।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय पश्चिम बंगाल सरकार के साथ लगातार संपर्क में रहकर स्थिति पर कड़ी निगरानी बनाए हुए है।

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एक खुले बजट की ओर

January 25, 2026

 


बजट की गोपनीयता की रस्म, जो औपनिवेशिक काल के रहस्य में लिपटी हुई है और बदनाम ‘बजट बंकर’ द्वारा दर्शाई गई नाटकीय सख्ती के साथ लागू की जाती है, 21वीं सदी के लोकतंत्र में एक पुरानी बात लगती है, जो पारदॢशता और भागीदारी वाली शासन व्यवस्था के लिए कोशिश कर...


बजट की गोपनीयता की रस्म, जो औपनिवेशिक काल के रहस्य में लिपटी हुई है और बदनाम ‘बजट बंकर’ द्वारा दर्शाई गई नाटकीय सख्ती के साथ लागू की जाती है, 21वीं सदी के लोकतंत्र में एक पुरानी बात लगती है, जो पारदॢशता और भागीदारी वाली शासन व्यवस्था के लिए कोशिश कर रहा है। यह परंपरा, जिसमें केंद्रीय बजट संसद में तय दिन पर ही खोला जाता है, समझदारी भरे आॢथक प्रबंधन का स्तंभ कम और पुरानी औपनिवेशिक मानसिकता का अवशेष ज्यादा है।


इस अवधारणा के जनक रॉबर्ट वालपोल थे, जो ब्रिटेन के पहले प्रधानमंत्री थे (और अपने प्रधानमंत्रित्व काल में चांसलर ऑफ एक्सचेकर भी थे)। 1733 में, वालपोल के विरोधियों ने उनके टैक्स प्रस्तावों का मजाक उड़ाते हुए उन्हें जादूगर की चाल बताया और ‘द बजट ओपन्ड’ शीर्षक से एक पैम्फलेट प्रकाशित किया, जिसमें वित्तीय योजना को ‘चालों की थैली’ से प्रकट किया गया एक ‘महान रहस्य’ बताया गया था। वालपोल और तब से हर चांसलर ने अपने वित्तीय प्रस्तावों की गोपनीयता का इस्तेमाल सट्टेबाजी वाले बाजार के हितों की रक्षा करने की बजाय संसदीय विरोधियों को मात देने और जनता के गुस्से को कम करने के लिए किया। इस प्रथा को ब्रिटिश भारत में लाया गया और तेज किया गया, जहां बजट लोकतांत्रिक बातचीत का नहीं, बल्कि शाही शोषण का एक उपकरण था। आज के नॉर्थ ब्लॉक का बजट बंकर औपनिवेशिक किलेबंदी वाली मानसिकता का सीधा वंशज है।


इस गोपनीयता के क्लासिक तर्क आधुनिक संदर्भ में कमजोर हैं। रियल-टाइम डाटा एनालिटिक्स, एल्गोरिदमिक ट्रेङ्क्षडग और वैश्विक पूंजी प्रवाह के युग में, यह धारणा कि कुछ हफ्तों की गुप्त तैयारी बाजारों को प्रभावी ढंग से ‘हैरान’ कर सकती है, भोली है। इसकी बजाय, जटिल वित्तीय और टैक्स उपायों की अचानक, बड़े पैमाने पर घोषणा अक्सर अस्थिरता पैदा करती है क्योंकि बाजार बिना किसी विश्लेषक की पहले की जांच या चरणबद्ध बहस के सैंकड़ों पन्नों की घनी नीति को समझने की कोशिश करते हैं। यह जिस असली सट्टेबाजी को बढ़ावा देता है, वह राजनीतिक किस्म की होती है-उन्मादी मीडिया अटकलें और लॉबिस्टों की फुसफुसाहट वाली मुहिम, जो सूचना के अभाव में पनपती है। इसके अलावा, यह दावा कि गोपनीयता अनुचित लाभ को रोकती है, खोखला है, जब हम यह सोचते हैं कि परिष्कृत कॉर्पोरेट संस्थाओं के पास आम नागरिक या छोटे व्यवसाय की तुलना में तत्काल बजट घोषणा का विश्लेषण करने और उस पर प्रतिक्रिया करने के लिए हमेशा अधिक संसाधन होते हैं। 


स्वीडन, नीदरलैंड्स और जर्मनी जैसे देश ओपन बजट बनाने के सिद्धांतों पर काम करते हैं। मुख्य पैरामीटर - वित्तीय सीमाएं, प्रमुख नीति दिशा, राजस्व पूर्वानुमान महीनों पहले प्रकाशित किए जाते हैं और उन पर बहस होती है। फ्रांस भी एक पारिभाषित मल्टी-ईयर वित्तीय ढांचे के भीतर बजट पर एक व्यापक सार्वजनिक और संसदीय चर्चा करता है। विधायिका सालाना तमाशे के लिए एक निष्क्रिय दर्शक बनने की बजाय शासन में एक भागीदार बन जाती है। ऐसी पारदॢशता का सीधा संबंध उच्च क्रैडिट रेटिंग, कम उधार लागत और अधिक वित्तीय स्थिरता से है - ऐसे परिणाम, जिनकी भारत को सख्त जरूरत है।


भारत के लिए ऐसे मॉडल की ओर बढऩे के फायदे बहुत ज्यादा हैं। सबसे पहले, यह कार्यपालिका पर एक मजबूत अनुशासन लागू करता है। दूसरा, यह ठोस पॉलिसी में तालमेल को बढ़ावा देता है। जब बड़ी पहल, चाहे वह कोई नई वैल्फेयर स्कीम हो या डिफैंस मॉडर्नाइजेशन प्लान, बजट से पहले के बयान में बताई जाती हैं, तो संसदीय समितियां हितधारकों से चर्चा कर, उनकी व्यवहार्यता का आकलन और लंबे समय के राष्ट्रीय लक्ष्यों के साथ तालमेल का मूल्यांकन कर सकती हैं। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह राजनीतिक रूप से तय किए गए आॢथक पैकेजों के लगातार विवाद को खत्म कर देगा। अगर इन आबंटनों पर खुले बजट फ्रेमवर्क के हिस्से के रूप में चर्चा की जाती है, तो उनका जरूरत, प्रदर्शन और समानता के वस्तुनिष्ठ मानदंडों के आधार पर मूल्यांकन किया जा सकता है, जिससे उन्हें ज्यादा वैधता मिलेगी।


भारत के लिए आगे का रास्ता धीरे-धीरे, सोच-समझकर कैलिब्रेटेड खुलापन अपनाना है। यह प्रक्रिया बजट दिवस से दो-तीन महीने पहले एक अनिवार्य प्री-बजट वित्तीय रणनीति विवरण के साथ शुरू हो सकती है। साथ ही, टैक्स प्रस्तावों पर एक तकनीकी दस्तावेज एडवांस रूलिंग अथॉरिटी और विशेषज्ञों के एक चुनिंदा पैनल के साथ कड़ी गोपनीयता के तहत सांझा किया जा सकता है ताकि प्रशासनिक व्यवहार्यता की जांच की जा सके और केवल सटीक दर परिवर्तनों की घोषणा उसी दिन की जाए।  अब समय आ गया है कि हम अपनी वित्तीय योजना के केंद्र में सूचित बहस की रोशनी लाएं, क्योंकि जैसा कि जस्टिस लुई ब्रैंडिस की प्रसिद्ध पंक्तियां हैं, धूप सबसे अच्छा कीटाणुनाशक है। राष्ट्र का वित्तीय स्वास्थ्य और उसके लोकतंत्र की अखंडता इससे कम कुछ भी नहीं मांगती।

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‘चौथे स्तंभ’ का काम सत्ता से सवाल पूछना, सच को सामने लाना भी

January 25, 2026


 फैज अहमद फैज की यह रचना उन द्वारा लिखी ‘जेल डायरी’ से प्रेरित है। ये पंक्तियां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदी के बावजूद एक शायर व लेखक के हौसले को दर्शाती हैं। 1950 के दशक के बाद फैज अहमद फैज को उनके प्रगतिशील, क्रांतिकारी और वामपंथी विचारों के...


मता-ए-लौह-ओ-कलम छिन गई तो क्या गम है, 

कि खून-ए-दिल में डुबो ली हैं उंगलियां मैंने, 

जुबां पे मोहर लगी है तो क्या, 

कि रख दी है हर एक हल्का-ए-जंजीर में जुबां मैंने।


फैज अहमद फैज की यह रचना उन द्वारा लिखी ‘जेल डायरी’ से प्रेरित है। ये पंक्तियां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदी के बावजूद एक शायर व लेखक के हौसले को दर्शाती हैं। 1950 के दशक के बाद फैज अहमद फैज को उनके प्रगतिशील, क्रांतिकारी और वामपंथी विचारों के कारण सत्ताधारी ताकतों द्वारा बार-बार निशाना बनाया गया और उनकी लेखनी पर पाबंदी लगाई गई लेकिन वह हमेशा अपनी कलम से आवाज उठाते रहे।

शायरों, लेखकों, सम्पादकों पर हकूमतों द्वारा उनकी आवाज दबाना कोई नई बात नहीं है और जब-जब अत्याचार हुए, राज करने वाले राजाओं को बाद में इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़े थे। इतिहास इस बात का साक्षी है कि राजा खत्म हो गए, परंतु सच्चाइयां आज भी जिंदा हैं।

‘पंजाब केसरी’ समाचार पत्र समूह पर वर्तमान हकूमत द्वारा सच्चाई न सुन पाने पर जो दमनकारी नीति अपनाई गई है, ये चालें पुरानी हो चुकी हैं। आज सोशल मीडिया का जमाना है। सच्चाई सबके सामने है। शीश महल संबंधी एक खबर के प्रकाशन पर तिलमिलाहट क्यों, वह भी, जब दूसरा पक्ष भी प्रकाशित किया गया हो।

हम को मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन, 

दिल के खुश रखने को गालिब ये ख्याल अच्छा है।


‘पंजाब केसरी’ के संस्थापक संपादक लाला जगत नारायण जी और रमेश चंद्र जी को आतंकवाद के खिलाफ देश की एकता और अखंडता की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान देना पड़ा था। पत्रकारों की कुर्बानियों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत के विभिन्न प्रांतों में लिखने या बोलने पर 9 पत्रकारों की हत्या कर दी गई और 33 पर हमले हुए। आवाज अब भी दबाई नहीं जा सकती।

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाली प्रैस की भूमिका सिर्फ खबरें देना भर नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना, सच को सामने लाना और जनता की आवाज बनना भी है। लेकिन जब-जब प्रैस की आवाज दबाने की कोशिश की जाती है, तब-तब यह सिर्फ पत्रकारिता पर हमला नहीं होता, बल्कि पूरे लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुंचती है।

राहत इंदौरी का यह शे’र भी याद रखना चाहिए-

शाखाओं से टूट जाएं वो पत्ते नहीं हैं हम,

आंधी से कोई कह दे कि औकात में रहे।


जब पत्रकार डर के माहौल में काम करने लगते हैं, जब सच्ची खबरों पर रोक लगाई जाती है, जब सवाल पूछने वालों को धमकाया या बदनाम किया जाता है, तब समाज धीरे-धीरे अंधेरे की ओर बढऩे लगता है।

उर्दू के शायर इकबाल अशहर का यह शे’र :

यही जूनून यही एक ख्वाब मेरा है,

मैंं वहां चिराग जला दूं जहां अंधेरा है,

तेरी रजा भी तो शामिल थी मेरे बुझने में,

मैं जो जल उठा हूं तो यह कमाल भी तेरा है।

आज कई जगह यह देखने को मिल रहा है कि प्रैस पर दबाव बनाया जा रहा है-कभी विज्ञापनों के जरिए, कभी सरकारी एजैंसियों के दुरुपयोग के जरिए, कभी कानूनी शिकंजे के जरिए और कभी डर व धमकियों के माध्यम से। कुछ मामलों में तो सच लिखने की कीमत जेल, मुकद्दमे या हमलों के रूप में चुकानी पड़ रही है। यह स्थिति बेहद ङ्क्षचताजनक है, क्योंकि अगर प्रैस ही स्वतंत्र नहीं रहेगी, तो आम आदमी की आवाज कौन उठाएगा?

इस बात की नौबत न आ जाए, 

वो जो ख्वाब थे मेरे जेहन में, 

न मैं कह सका न लिख सका,

कि जुबां मिली तो कटी हुई,

कि कलम मिला तो बिका हुआ।


प्रैस की आजादी का मतलब यह नहीं कि वह निरंकुश हो जाए, बल्कि इसका मतलब यह है कि वह बिना डर और दबाव के सच दिखा सके। सत्ता की आलोचना करना, गलत नीतियों को उजागर करना और जनहित के मुद्दों को सामने लाना ही पत्रकारिता का असली धर्म है।

असली धर्म निभाया है ‘पंजाब केसरी’ ग्रुप ने। दो मुख्य संपादकों द्वारा दिए गए सर्वोच्च बलिदान का दूसरा शायद ही कहीं कोई उदाहरण हो। आतंकवाद के खिलाफ लिखना और उनको सरेआम सरे बाजार दिन दिहाड़े गोलियों से शहीद कर देना और इसके बावजूद आतंकवाद के आगे घुटने न टेकना पत्रकारिता का सच्चा धर्म है।


आतंकवाद के खिलाफ न लिखकर भी वे अपनी जान बचा सकते थे, परन्तु उन्होंने पत्रकारिता के उच्च मानदंडों के साथ समझौता नहीं किया, कलम उसकी किसी दरबार की जागीर नहीं, किसी के आगे झुकना हमारी तासीर (मूल स्वभाव) नहीं। ‘पंजाब केसरी’ ग्रुप ने पत्रकारिता के अतिरिक्त जो समाज सेवा का बीड़ा उठाया है, वह भी अपने आप में मिसाल है। कहा जाता है कि पत्रकार पीड़ित मानवता का वकील होता है, जो अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की आवाज सरकार के कानों तक बुलंद करता है।


‘पंजाब केसरी’ के संचालकों द्वारा चलाया जा रहा ‘शहीद परिवार फंड’ अपने आप में एक वल्र्ड रिकार्ड है, क्योंकि इतने लंबे समय तक शायद समाचार पत्र के माध्यम से कोई भी सेवा प्रोजैक्ट नहीं चलाया गया। इसके अतिरिक्त देश के किसी भी प्रांत में आई प्राकृतिक आपदाओं में रिलीफ फंड चलाना, प्रधान संपादक पद्मश्री विजय कुमार चोपड़ा द्वारा इस क्षेत्र के विभिन्न नगरों में जाकर सेवा प्रोजैक्टों में भाग लेना व लोगों को प्रेरित करना अपने आप में  एक अनूठा उदाहरण है।

वैल्फेयर प्रोजैक्टों के बावजूद यदि वर्तमान हकूमत द्वारा ‘पंजाब केसरी’ ग्रुप पर दमनकारी नीति अपनाई जा रही है तो फिर इसका जवाब अवाम पर ही छोड़ देना चाहिए।

‘चौथे स्तंभ’ का काम सत्ता से सवाल पूछना, सच को सामने लाना भी ‘चौथे स्तंभ’ का काम सत्ता से सवाल पूछना, सच को सामने लाना भी Reviewed by SBR on January 25, 2026 Rating: 5

ट्रम्प किस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन कर रहे हैं

January 16, 2026

 


अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दबदबा उस समय पूरी तरह से प्रदॢशत हुआ, जब उन्होंने फ्लोरिडा स्थित अपने आवास मार-ए-लागो में मंच पर आकर वेनेजुएला के खिलाफ अमरीकी सैन्य कार्रवाई की घोषणा की। उन्होंने कहा कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और...


अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दबदबा उस समय पूरी तरह से प्रदॢशत हुआ, जब उन्होंने फ्लोरिडा स्थित अपने आवास मार-ए-लागो में मंच पर आकर वेनेजुएला के खिलाफ अमरीकी सैन्य कार्रवाई की घोषणा की। उन्होंने कहा कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को न्यूयॉर्क में ‘नार्को-आतंकवाद’ के आरोपों में मुकद्दमे का सामना करने के लिए गिरफ्तार करना एक ‘शानदार हमला’ था। उन्होंने घोषणा की कि अमरीका देश का ‘शासन’ चलाएगा और इसके तेल भंडार का उपयोग उन अमरीकी कंपनियों को मुआवजा देने के लिए करेगा, जिनके निगमों का लगभग दो दशक पहले राष्ट्रीयकरण कर दिया गया था।


क्या वेनेजुएला में अमरीकी सैन्य कार्रवाई वास्तव में नशीले पदार्थों से जुड़े आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए थी? सन 2000 से, मादक पदार्थों की ओवरडोज से लगभग सवा दस लाख अमरीकी नागरिकों की मौत हो चुकी है। लेकिन, इनमें से लगभग 69 प्रतिशत मौतें फेंटानिल के कारण हुईं, जिसके पूर्ववर्ती रसायन चीन में उत्पादित होते हैं। वेनेजुएला अमरीका में कोकीन का एक मामूली स्रोत है। हालांकि, वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है। ट्रम्प की इस घोषणा के बाद कि अमरीकी तेल कंपनियां, जो ‘दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियां’ हैं, अब दक्षिण अमरीकी देश में प्रवेश करेंगी, उनके इरादों की और पुष्टि की कोई आवश्यकता नहीं रह गई है।


अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन : वेनेजुएला में अमरीका की कार्रवाई अंतर्राष्ट्रीय कानून का सबसे घोर उल्लंघन है। इस बात पर जोर देने की शायद ही जरूरत है कि इस कार्रवाई ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर के मूल अनुच्छेद 2(4) का उल्लंघन किया है, जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी या आत्मरक्षा (अनुच्छेद 51) के अलावा किसी भी राज्य की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल के खतरे या उपयोग को प्रतिबंधित करता है। यह घटना अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में शक्ति संतुलन के बिगडऩे का संकेत देती है। मूल रूप से कई देशों के बीच शांति बनाए रखने के लिए यूरोप द्वारा निर्मित इस व्यवस्था में 20वीं शताब्दी में आमूल-चूल परिवर्तन हुए। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, इसने अमरीका और सोवियत संघ को मुख्य भूमिका में रखते हुए एक द्विध्रुवीय संरचना को जन्म दिया। इस दौरान, कोई भी देश बेरोकटोक शक्ति का इस्तेमाल नहीं कर सका। एक देश दूसरे को संतुलित करता रहा, जिससे एक नाजुक शांति बनी रही।


सत्ता का संतुलन : वेनेजुएला पर हमले से दिसम्बर, 1971 में बंगलादेश युद्ध के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप में सत्ता के समीकरणों की याद आती है। इसने राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के भारत-विरोधी प्रशासन की साजिशों को नाकाम कर दिया। जब वाशिंगटन ने नई दिल्ली को डराने और आत्मसमर्पण कराने के लिए अमरीकी सातवें बेड़े की टास्क फोर्स टी.एफ.-74 को तैनात किया, तो सोवियत संघ ने क्रूजर, विध्वंसक और पनडुब्बियों की जवाबी तैनाती करके खतरे को बेअसर कर दिया। यह शक्ति संतुलन की अवधारणा के एक विशिष्ट उदाहरण के रूप में एक महाशक्ति द्वारा दूसरी महाशक्ति का प्रतिकार था। इसी तरह, जब 1973 के योम किप्पुर युद्ध में मिस्र की तीसरी सेना पर इसराईल के हाथों विनाश का खतरा मंडराया, तो सोवियत नेता लियोनिद ब्रेझनेव ने हवाई डिवीजनों को तैयार क्षेत्रों में तैनात किया, क्योंकि मिस्र मास्को का करीबी सहयोगी था। चिंतित अमरीका ने डेफकोन-3 (अमरीकी रक्षा तत्परता/खतरे का अलर्ट) घोषित किया। इसराईल ने आत्मसमर्पण कर दिया और सोवियत चेतावनी ने मिस्र की सेना को बचा लिया।


हालांकि, 1991 में सोवियत संघ के पतन के साथ, दुनिया ने अमरीका द्वारा सत्ता के अनियंत्रित दुरुपयोग को चुनौती देने में सक्षम एकमात्र शक्ति खो दी। इससे उत्साहित होकर, वाशिंगटन ने पूर्वनिवारक (प्री-एम्पटिव) युद्ध में शामिल होने का अधिकार प्राप्त कर लिया है। इसने प्रत्यक्ष कार्रवाई या समॢथत आंदोलनों के माध्यम से ईराक, मिस्र, लीबिया और सीरिया में सरकारों को उखाड़ फैंका है। निकट भविष्य में, केवल चीन ही अमरीका के प्रतिसंतुलन के रूप में उभर सकता है। रूस और चीन के बीच एक ढीला गठबंधन मौजूदा एकध्रुवीय संरचना को चुनौती दे सकता है, हालांकि प्रमुख शक्तियों के बीच मतभेद एक स्थायी सांझेदारी को रोक सकते हैं। अमरीका ने एक बार फिर भारत के सुरक्षा हितों के प्रति अपनी असंवेदनशीलता साबित कर दी है, ऐसे में नई दिल्ली को एक प्रतिसंतुलनकारी शक्ति बनने के लिए अभी लंबा सफर तय करना है। उसे अपने सैन्य-औद्योगिक परिसर के निर्माण और रक्षा को मजबूत करने के लिए एक कल्पनाशील और लीक से हटकर रणनीति विकसित करनी होगी।-थॉमस मैथ्यू

ट्रम्प किस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन कर रहे हैं ट्रम्प किस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन कर रहे हैं Reviewed by SBR on January 16, 2026 Rating: 5

घरेलू महिलाएं : खुद न करें अपनी खुशी की हत्या!

January 13, 2026

 


आज का समय फेसबुक, व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम का है। हर व्यक्ति बोल रहा है, लिख रहा है, दिख रहा है। प्रतिभा को मंच मिल रहा है, अभिव्यक्ति को विस्तार मिल रहा है। लेकिन इसी शोर के बीच एक तबका ऐसा है, जो आज भी चुप है-या यूं कहें कि चुप करा दिया गया...


आज का समय फेसबुक, व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम का है। हर व्यक्ति बोल रहा है, लिख रहा है, दिख रहा है। प्रतिभा को मंच मिल रहा है, अभिव्यक्ति को विस्तार मिल रहा है। लेकिन इसी शोर के बीच एक तबका ऐसा है, जो आज भी चुप है-या यूं कहें कि चुप करा दिया गया है।

मैं उन स्त्रियों की बात कर रही हूं, जिनका पूरा जीवन केवल नर्म, गोल और गर्मा-गर्म रोटियां बनाते-बनाते ठंडा पड़ गया। 40 साल पहले हालात अलग थे, तब विकल्प नहीं थे। लेकिन आज भी वही जीवन जीना, वही तर्क देना, यह मजबूरी नहीं, आदत बन चुकी है। स्पष्ट कर दूं-रोटी बनाना कोई अपराध नहीं, अपराध यह है कि आप खुद को केवल रोटी बनाने की मशीन में बदल दें। ‘रोटी बनाना’ और ‘रोटी भी बनाना’, इन दोनों में वही अंतर है जो जिंदा रहने और जीने में होता है।


कटु सत्य यह है कि रोटी को एकदम गोल बनाने की जिद में आपने अपने व्यक्तित्व की सारी धार कुंद कर दी। दूसरों की थाली गर्म रखने में आप खुद ठंडी पड़ गईं और यह कोई त्याग नहीं, यह आत्म-उपेक्षा है। आप सबको उतनी ही गर्म रोटी खिलाइए, जितनी आप स्वयं भी उनके साथ बैठकर खा सकें। वरना याद रखिए, जो औरत खुद नहीं खाती, उसे कोई खिलाने नहीं आता। आपने अपनी पूरी ऊर्जा फर्श चमकाने, रसोई संभालने और चूल्हे में झोंक दी। अब जब खुद को पीछे छूटा पाती हैं, तो अपनी कुंठा नई पीढ़ी, कामकाजी महिलाओं या बहुओं पर थोप देती हैं। यह असंतोष का समाधान नहीं, सिर्फ उसका बदसूरत रूप है। अब दूसरों से जलना बंद कीजिए। सच तो यह है कि जलन उनकी नहीं, अपनी अधूरी संभावनाओं की है। ठहरिए और खुद से पूछिए-


क्या मैं आज वही हूं, जो मैं हो सकती थी?

अगर जवाब ‘नहीं’ है, तो दोष दुनिया को नहीं, अपनी प्राथमिकताओं को दीजिए। जिन कारणों ने आपको रोका, उन्हें रोने की सूची से हटाकर जीवन की ‘बी-लिस्ट’ में डाल दीजिए।

कड़वा सच यह है कि दुनिया आपको आपके त्याग से नहीं, आपकी उपलब्धियों से पहचानती है। आपने कितना सहा, इससे किसी को फर्क नहीं पड़ता। यहां तक कि परिवार को भी नहीं। बच्चे बड़े होते ही व्यस्त हो जाते हैं और पति की व्यस्तता तो वर्षों पुराना बहाना है।अक्सर देखा जाता है कि रोटी ठंडी हो रही हो और आप आवाज दें, तो जवाब मिलता है-‘आपको तो खाने की ही पड़ी है।’ सोचिए, जिस खाने के लिए आपने अपने सपने फ्रीजर में रख दिए, उसकी कीमत किसी की नजर में क्या है।

इसलिए अब वक्त है कि ‘रोटी ही बनाना’ को ‘रोटी भी बनाना’ में बदला जाए।


जीवन कोई गैस सिलैंडर नहीं है, जो जब चाहे बदल लिया जाए। जो करना है, अभी कीजिए। क्योंकि भविष्य में न आपका बेटा अपनी पत्नी को सिर्फ रोटी बनाने देगा और न आपकी बेटी खुद को चूल्हे तक सीमित करेगी। तब उन्हें कोसने से अच्छा है कि आज खुद को बदला जाए।

खाना बनाइए, घर संभालिए लेकिन इसके बाद खुद को भी समय दीजिए। कुछ रचिए, कुछ सीखिए। जब आप खुद को गंभीरता से लेंगी, तब परिवार भी आपको हल्के में लेना बंद कर देगा। और हां! जिस दिन आप रसोई के समय सबके पीछे भागना बंद करेंगी, उसी दिन सब समय पर खाने आने लगेंगे। सम्मान मांगना नहीं पड़ता, सीमाएं तय करनी पड़ती हैं। यह लेख घर-परिवार छोडऩे की वकालत नहीं करता। यह सिर्फ इतना कहता है कि घर बचाने के चक्कर में खुद को मत खोइए। किसी भूली हुई हॉबी को फिर से उठाइए-लिखिए, पढि़ए, सीखिए, कमाइए या बस खुद के लिए जिएं। शुरुआत में तालियां नहीं मिलेंगी लेकिन याद रखिए, जो औरत खुद के लिए खड़ी हो जाती है, उसे गिराना आसान नहीं होता।और अंत में-

जीवन जीना कोई मजबूरी नहीं, 

यह एक कला है, एक तैयारी है।

खुद को खुश रखना कोई स्वार्थ नहीं,

यह आपकी सबसे पहली जिम्मेदारी है।-प्रज्ञा पांडेय ‘मनु’

घरेलू महिलाएं : खुद न करें अपनी खुशी की हत्या! घरेलू महिलाएं : खुद न करें अपनी खुशी की हत्या! Reviewed by SBR on January 13, 2026 Rating: 5

पंजाब में गैंगस्टरों का उदय

January 13, 2026

 


2026 के सिर्फ पहले हफ्ते में, पंजाब में लगातार 4 टारगेटेड किङ्क्षलग हुईं, जो राज्य में मुश्किल ङ्क्षहसा के जमे हुए पैटर्न के लगातार बने रहने और बढऩे तथा कानून-व्यवस्था में गंभीर कमियों को दिखाती हैं। हमलावरों का साफ तौर पर बेखौफ होना, खालिस्तान...


2026 के सिर्फ पहले हफ्ते में, पंजाब में लगातार 4 टारगेटेड किङ्क्षलग हुईं, जो राज्य में मुश्किल ङ्क्षहसा के जमे हुए पैटर्न के लगातार बने रहने और बढऩे तथा कानून-व्यवस्था में गंभीर कमियों को दिखाती हैं। हमलावरों का साफ तौर पर बेखौफ होना, खालिस्तान समर्थक चरमपंथी तत्वों, नारकोटिक्स की तस्करी और स्थानीय राजनीतिक दुश्मनी से जुड़े ट्रांसनैशनल ऑर्गेनाइज्ड क्राइम और गैंगस्टर नैटवर्क की बढ़ती हिम्मत को दिखाता है।


5 जनवरी, 2026 को, गगनदीप सिंह, जो बाऊंसर के तौर पर काम करने वाले एक पूर्व कबड्डी खिलाड़ी थे और जगराओं की ‘आप’ विधायक सरवजीत कौर के करीबी रिश्तेदार थे, को जगराओं में मानुके गांव के बाहरी इलाके में अनाज मंडी के पास एक खेत में हथियारबंद हमलावरों ने गोली मार दी। शुरुआती जांच से पता चलता है कि हत्या दुश्मन ग्रुप्स के बीच झगड़े के बाद हुई। 4 जनवरी, 2026 को, ‘आप’ सरपंच जरमल सिंह को अमृतसर जिले में अमृतसर-अटारी रोड पर वेरका के पास एक रिजॉर्ट में भीड़ भरे शादी समारोह के दौरान 2 बिना मास्क वाले हथियारबंद हमलावरों ने गोली मार दी। उनको एक साल से ज्यादा समय से विदेश में रहने वाले गैंगस्टर प्रभ दासुवाल से जबरन वसूली की धमकियां मिल रही थीं। 


3 जनवरी, 2026 को, कांग्रेस पार्टी के कार्यकत्र्ता उमरसिर सिंह को मोगा जिले के ङ्क्षभडर कलां गांव में अज्ञात हथियारबंद हमलावरों ने गोली मार दी। इससे पहले, 2 जनवरी, 2026 को, हेमप्रीत कौर, एक एन.आर.आई., जो लगभग एक महीने पहले विदेश से लौटी थी, की कपूरथला जिले में दो मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने टारगेटेड हमले में गोली मारकर हत्या कर दी।  


खास बात यह है कि 2016 में इस पैटर्न के फिर से शुरू होने के बाद से, 8 साल (2008-2015) के बाद, 2025 में पंजाब में टारगेटेड किलिंग की सबसे ज्यादा संख्या दर्ज की गई है, जिसमें ज्यादातर घटनाएं विदेशों में मौजूद गैंगस्टर सिंडिकेट और कट्टरपंथी खालिस्तानी तत्वों से जुड़े ट्रांसनैशनल क्राइम नैटवर्क से जुड़ी हैं। खालिस्तान एक्सट्रीमिज्म मॉनिटर (के.ई.एम.) के डाटा से पता चलता है कि पंजाब में गैंगस्टर या आतंक से जुड़ी ये मौतें हुईं-2016 में 3 (सभी आम नागरिक, टारगेटेड किलिंग), 2017 में 6 (सभी आम नागरिक, टारगेटेड किङ्क्षलग), 2018 में 3 (आतंकवादी हमले में आम नागरिक मारे गए), 2019 में 2 (एक ब्लास्ट में दो आतंकवादी मारे गए), 2020 में 2 (आम नागरिक, टारगेटेड किङ्क्षलग), 2021 में 1 (ब्लास्ट में आतंकवादी मारा गया), 2022 में 3 (आम नागरिक, टारगेटेड किलिंग), 2023 में 6 (3 आम नागरिक और 3 गैंगस्टर, सभी टारगेटेड किलिंग), 2024 में 9 (7 आम नागरिक और 2 गैंगस्टर-8 टारगेटेड किलिंग और एक इंटर-गैंग वॉर) और 2025 में तेजी से बढ़कर 31 (19 आम नागरिक, 3 आतंकवादी और 9 गैंगस्टर, जिनमें 21 टारगेटेड किलिंग) शामिल हैं। 

इनमें से ज्यादातर टारगेटेड किलिंग एक कमांड-एंड-कंट्रोल स्ट्रक्चर को दिखाती हैं, जो उत्तर भारत में लोकल और मिड-लैवल गैंग के ऑपरेटिव को अमरीका, कनाडा, यूरोप, लातिन अमरीका, मिडल ईस्ट और साऊथ-ईस्ट एशिया से ऑपरेट करने वाले विदेश में मौजूद गैंग लीडर्स के साथ-साथ पाकिस्तान की आई.एस.आई. के सपोर्ट वाले गैंगस्टर्स और आतंकवादियों से जोड़ता है। 2016-17 के दौरान, ऐसी ङ्क्षहसा में मुख्य रूप से गैर-सिख धार्मिक नेताओं और खालिस्तान विरोधी लोगों को निशाना बनाया गया ताकि सांप्रदायिक तनाव बढ़ाया जा सके और अलगाववादी भावना को फिर से जगाया जा सके। हाल के सालों में, खासकर 2022 में गायक सिद्धू मूसेवाला की हत्या के बाद, टारगेट प्रोफाइल में एन.आर.आई., व्यापारी और बिजनैसमैन, कबड्डी प्लेयर जैसे खिलाड़ी और पंजाबी गायक शामिल हो गए हैं, जो इन क्रिमिनल-टैरारिस्ट नैटवर्क के अंदर बड़े पैमाने पर ‘एक्सटॉर्शन रैकेट’ की बढ़ती केंद्रीयता को दिखाता है। 


31 दिसम्बर, 2025 को, पंजाब के डी.जी.पी. गौरव यादव ने पाकिस्तानी आर्मी चीफ असीम मुनीर और आई.एस.आई. पर गैंगस्टरों और आतंकवादियों को हथियार सप्लाई करके राज्य को अस्थिर करने की नई साजिशें रचने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि 40 विदेशी 

गैंगस्टर पंजाब में हिंसा भड़काने की कोशिश में एक्टिव थे, जबकि 400 से ज़्यादा गैंग या मॉड्यूल अभी काम कर रहे थे, जिनकी सही संख्या अलग-अलग हो सकती है।


डी.जी.पी. ने बताया कि 2025 में पूरी कानून-व्यवस्था की स्थिति नियंत्रण में और ज्यादातर राज्यों के मुकाबले बेहतर थी। उन्होंने बताया कि साल के दौरान, एंटी-गैंगस्टर टास्क फोर्स (ए.जी.टी.एफ.) और फील्ड यूनिट्स ने 416 गैंगस्टर मॉड्यूल खत्म किए, उनसे जुड़े 992 अपराधियों को गिरफ्तार किया, 620 हथियार और 252 गाडिय़ां जब्त कीं और केंद्रीय एजैंसियों के साथ मिलकर अनमोल बिश्नोई, परमिंदर सिंह उर्फ पिंदी, सुखदेव कुमार उर्फ मनीष बेदी, और साजन मसीह उर्फ गोरू जैसे गैंगस्टरों का प्रत्यर्पण करवाया। सिख समुदाय में खालिस्तानी चरमपंथी गैंग नैटवर्क के जरिए काम करते हैं, लड़ाकों को भर्ती करते हैं, अक्सर बेरोजगार युवा, जिनका कोई पिछला क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं होता, उन्हें कैश इनाम या विदेश में बेहतर जिंदगी का वादा करके टारगेटेड किलिंग और ग्रेनेड हमलों सहित दूसरे ङ्क्षहसक कामों को अंजाम देते हैं। विपक्ष ने ‘आप’ सरकार पर कानून-व्यवस्था की नाकामी का आरोप लगाया, वहीं सरकार ने मौजूदा ‘गैंगस्टरवाद’ संकट की जड़ का कारण पिछले डेढ़ दशक में पिछली सरकारों के गलत शासन और राजनीतिक संरक्षण को बताया। क्रिमिनल नैटवर्क की राजनीतिक पकड़, जो लोकल सत्ता संघर्ष और गहरी क्रिमिनल-पॉलिटिकल सांठगांठ से जुड़ी हुई है, हाल के लोकल बॉडी चुनावों में भी साफ दिखी। 


मौजूदा हाइब्रिड खतरा, जो ट्रांसनैशनल ऑर्गेनाइज्ड क्राइम, नारकोटिक्स नैटवर्क और एक्सट्रीमिस्ट एक्टर्स के मिलने से पैदा हुआ है, ने पंजाब में जन सुरक्षा को कमजोर कर दिया है। लगातार पुलिस ऑप्रेशन के बावजूद, बार-बार दिन-दिहाड़े टारगेटेड किलिंग से पता चलता है कि इंटैलीजैंस, प्रिवैंटिव पुलिसिंग और रोकथाम में लगातार कमी है। (लेखक-रिसर्च एसोसिएट, इंस्टिच्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमैंट)-निजीश एन

पंजाब में गैंगस्टरों का उदय पंजाब में गैंगस्टरों का उदय Reviewed by SBR on January 13, 2026 Rating: 5

मिथ्या चेतना का दर्शनशास्त्र

January 09, 2026


 कुल 1.4 अरब की आबादी वाले गणराज्य को निराशावाद से नहीं सुधारा जा सकता। रोजगार, उत्पादकता, निर्यात और समावेशन सबसे अच्छे समय में भी आसान नहीं होते। प्रगति डिजाइन, क्रियान्वयन, सुधार और परिमापन के नीरस मेल से आती है। नया साल निराशावाद को संशयवाद से...


कुल 1.4 अरब की आबादी वाले गणराज्य को निराशावाद से नहीं सुधारा जा सकता। रोजगार, उत्पादकता, निर्यात और समावेशन सबसे अच्छे समय में भी आसान नहीं होते। प्रगति डिजाइन, क्रियान्वयन, सुधार और परिमापन के नीरस मेल से आती है। नया साल निराशावाद को संशयवाद से अलग करने का भी क्षण है। आलोचनाओं का स्वागत है। मगर ये साक्ष्य तथा एक जटिल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र का शासन चलाने की ज्वलंत बाधाओं से आबद्ध होनी चाहिएं। 


पिछले वर्षों में टिप्पणी की एक नई विधा सामने आई है। यह सुधार के कार्य को मजाक में तबदील कर देती है। यह एक चिरपरिचित सांत्वना पेश करती है: भारत कदाचित अपने ही नीति निर्माताओं से अभिशप्त है। इस दृष्टिकोण के अपने नतीजे हैं। यह आंकड़ों और बाजारों में विश्वास को घटाता है। यह उद्यमियों और निवेशकों में नियतिवाद को प्रोत्साहित करता है। साथ ही यह बाहरी ताकतों को वार्ताओं में भारत को दबाव में लाने के लिए तैयार कथानक भी प्रदान करता है। मजबूत पेशेवर और शैक्षिक पृष्ठभूमि का दंभ भरने वाले कुछ टिप्पणीकारों का इस तरह की भंगिमा का सहारा लेना ङ्क्षचता की बात है। लेकिन वे संभवत: ध्यानाकर्षण या अब सरकार का हिस्सा नहीं होने के बावजूद प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए देश के खिलाफ अनाप-शनाप बोल कर अपना करियर बनाने की कोशिश में लगे हैं। 


उनका यह आरोप कि भारत के आंकड़े विशिष्ट तौर पर अविश्वसनीय हैं, हमारी विकास की दिशा के साथ मेल नहीं खाते। माल और सेवा कर (जी.एस.टी.) के अंतर्गत टैक्स संग्रह में जो वृद्धि हुई और इसने अनुपालन की जिस संस्कृति को पैदा किया है, वह एक दशक पहले नहीं थी। वर्ष 2024-25 में सकल जी.एस.टी. संग्रह 22 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा रहा। यानी औसतन प्रति माह 1.8 लाख करोड़ रुपए। डिजिटल भुगतान ने वित्तीय प्रदर्शन का एक और निशान छोड़ा है। नवम्बर, 2025 में यू.पी.आई. के जरिए 26 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा रकम के 20 अरब लेन-देन किए गए। 


नीति आयोग के राष्ट्रीय बहुआयामी निर्धनता सूचकांक के अनुसार 2013-14 और 2022-23 के बीच लगभग 24 करोड़ भारतीय बहुआयामी गरीबी से बाहर आ गए। अब बहुआयामी निर्धनता लगभग 30 प्रतिशत से घट कर तकरीबन 11 प्रतिशत रह गई है। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डी.बी.टी.) से डिलीवरी दुरुस्त हुई है। वर्ष 2025 में 45 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण हुआ। डी.बी.टी. काल में धन के अपव्यय में कमी के जरिए 3.5 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा रकम की बचत हुई। वित्तीय अनुशासन में सुधार के प्रभाव अब दिखाई देने लगे हैं। अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की सकल गैरनिष्पादित परिसंपत्ति (एन.पी.ए.) 2018 में 11.2 प्रतिशत से घट कर 2025 में 2.1 प्रतिशत रह गई है। यह सिर्फ ख्याली पुलाव बनाने से नहीं हुआ। भारत बड़े पैमाने पर निर्माण नहीं कर सकता, यह आरोप लगाने वाले मैन्युफैक्चरिंग परिवेश में हुए बदलावों को नजरअंदाज करते हैं। उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन (पी.एल.आई.) कार्यक्रम के तहत, 14 क्षेत्रों में 2 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश हुआ है, जिससे 18 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का अतिरिक्त उत्पादन और बिक्री हुई और 12 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला है। 2024-25 में सामान और सेवाओं का कुल निर्यात  825 अरब अमरीकी डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। 


किसी भी देश की प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति केवल एक योजना या एक मंत्रालय से नहीं आती, बल्कि यह बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक्स और प्रशासनिक सुधारों के मिले-जुले प्रभाव का परिणाम होती है। भारत में यह सुधार औद्योगिक गलियारों, मालगाडिय़ों की बेहतर कनैक्टिविटी, बंदरगाहों के बेहतर जुड़ाव और एक साथ काम करने वाले डिजिटल प्लेटफॉम्र्स के रूप में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं, जिससे समय की बचत होती है। कृषि और ग्रामीण क्षेत्र में कमियां गिनाना और यह मान लेना आसान है कि कुछ भी ठीक नहीं हो सकता। अब नीति का रुख बदल गया है। अब सरकार का ध्यान सीधे तौर पर मदद पहुंचाने और ऐसी संपदा बनाने पर है, जो उत्पादकता और सम्मान दोनों बढ़ाती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण जल जीवन मिशन है, आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 12.5 करोड़ से ज्यादा ग्रामीण घरों में नल से पानी का कनैक्शन पहुंचाया गया है। 


आयुष्मान भारत ने प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत 42 करोड़ से ज्यादा कार्ड जारी किए हैं, जिससे परिवारों को गंभीर बीमारियों के भारी खर्च नहीं करने पर आॢथक सुरक्षा प्राप्त हुई है। प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत लगभग 3 करोड़ घर बनकर तैयार हो चुके हैं, जिससे परिवारों को न केवल अपनी संपत्ति मिली है, बल्कि जीवन में आगे बढऩे का एक ठोस आधार भी दिया है। इसी तरह प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के माध्यम से 10 करोड़ से ज्यादा एल.पी.जी. कनैक्शन दिए गए हैं। सबसे ज्यादा निराशा अक्सर राज्यों की स्थिति को लेकर जताई जाती है, जैसे कि एक अरब से ज्यादा लोगों के देश को एक ही तरीके से चलाया जा सकता हो। लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे कई राज्यों ने यह दिखा दिया है कि बेहतर कानून व्यवस्था, परियोजनाओं की शीघ्र मंजूरी और अवसंरचना के निर्माण में निरंतर काम से निवेश और बेहतर नौकरियां मिल सकती हैं। 


भारत की प्रगति की कहानी अभी पूरी नहीं हुई, इस पर हमेशा बहस होती रहेगी। सवाल यह है कि नए साल की शुरुआत में हम किस तरह की बहस चुनते हैं। जब बड़े-बड़े पेशेवर लोग केवल अनुमानों या इशारों को ही ‘गहन विश्लेषण’ मान लेते हैं, तो वे उन संस्थाओं को कमजोर करते हैं, जो सुधारों को मुमकिन बनाते हैं। ये नतीजे ही हैं, जो आंकड़ों में भी दिखते हैं और महसूस भी किए जाते हैं। यह किसी भी तरह की निराशा पर भारी पड़ेंगे और लंबे समय तक बने रहेंगे।-हरदीप सिंह पुरी(केंद्रीय पैट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री)

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अमरीकी दबंगई के खतरे समझे शेष विश्व

January 09, 2026


 नए साल के शुरू में वेनेजुएला पर अमरीकी हमला और राष्ट्रपति मादुरो को पत्नी समेत उठा ले जाना विश्व शांति और सुरक्षा को गंभीर खतरे का ही इशारा  है। सभ्य समाज और कानून सम्मत व्यवस्था में कल्पना से भी परे होना चाहिए कि एक देश दूसरे देश पर हमला कर उसके...


नए साल के शुरू में वेनेजुएला पर अमरीकी हमला और राष्ट्रपति मादुरो को पत्नी समेत उठा ले जाना विश्व शांति और सुरक्षा को गंभीर खतरे का ही इशारा  है। सभ्य समाज और कानून सम्मत व्यवस्था में कल्पना से भी परे होना चाहिए कि एक देश दूसरे देश पर हमला कर उसके राष्ट्रपति को इस तरह पत्नी समेत उठा ले जाए, लेकिन 21वीं शताब्दी में यह होते हुए पूरी दुनिया ने देखा। इसके बावजूद अधिकांश देशों की प्रतिक्रिया निजी हानि-लाभ से प्रेरित है तो समझना मुश्किल नहीं कि हम तेजी से ‘जंगल राज’ की ओर बढ़ रहे हैं, जिसमें ‘जिसकी लाठी, उसी की भैंस’ होती है। 


बेशक विश्व व्यवस्था में ताजा उथल-पुथल का कारण बने अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो पर ड्रग्स तस्करी में संलिप्तता समेत कई तरह के आरोप लगाते रहे हैं लेकिन अंतर्राष्ट्रीय कानून इस तरह किसी संप्रभु देश पर हमला करने की छूट दूसरे देश को नहीं देते। ट्रम्प का दावा है कि मादुरो की गिरफ्तारी के साथ ही समुद्री रास्ते से ड्रग तस्करी के 97 प्रतिशत मामलों को खत्म कर दिया गया है। बकौल ट्रम्प, ड्रग तस्करी करने वाली हर नाव औसतन 25 हजार लोगों को मारती है लेकिन कोई विश्वसनीय अध्ययन इसकी पुष्टि नहीं करता कि सबसे ज्यादा तस्करी वेनेजुएला से होती है। 


फिर तस्करी रोकने के बहुत सारे उपाय हैं। अपनी सीमाओं पर चौकसी चाक-चौबंद करने की बजाय जिस देश से कथित रूप से तस्करी हो रही हो, उस पर हमला और उसके राष्ट्रपति को इस तरह गिरफ्तार कर लेना भविष्य के लिए खतरनाक मिसाल बन सकता है। अगर रूस इसी तरह यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की को उठा ले या फिर चीन भी ताईवान पर हमला कर ऐसा ही करे, तब क्या विश्व व्यवस्था नाम की कोई चीज रह जाएगी? राजधानी कराकास पर हमले के बाद मादुरो और उनकी पत्नी सीलिया फ्लोरेस को आतंकवादरोधी अमरीकी बल ‘डेल्टा फोर्स’ जिस तरह बैडरूम से घसीटता हुआ ले गया, वह किसी अंडरवल्र्ड गैंग की कार्रवाई ज्यादा लगती है। बेहद खौफनाक एवं असुरक्षित मैट्रोपोलिटन डिटैंशन सैंटर में रखे गए मादुरो पर नार्को टैररिज्म आदि के लिए अमरीका में मुकद्दमा चलाया जाना भी कई सवाल खड़े करता है। अमरीका ‘दुनिया का चौधरी’ नहीं है। ऐसे मामलों के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय बेहतर मंच हैं।


क्यूबा से ले कर अफगानिस्तान और इराक तक अनेक उदाहरण हैं, जब अमरीका ने आरोपों और आशंकाओं के जरिए माहौल बना कर संप्रभु देशों पर हमले करते हुए उन्हें तबाह कर दिया। सोवियत संघ समॢथत नजीबुल्लाह सरकार को हटाने के लिए अमरीका ने पहले तो पाकिस्तान की मदद से अफगानिस्तान में आतंकवादी तालिबान तैयार किए और फिर उन्हीं के खात्मे के नाम पर वहां हमला भी कर दिया। आज अफगानिस्तान बिखरा हुआ बर्बाद मुल्क है। खतरनाक जन संहारक हथियार होने के आरोप लगाते हुए अमरीका ने विश्व शांति और सुरक्षा के नाम पर इराक पर हमला किया और बिना पारदर्शी अदालती कार्रवाई के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को समंदर में दफन कर दिया। इराक के पास बताए गए जन संहारक हथियारों की बाबत दुनिया को आज तक कुछ पता नहीं चला, पर तेल आदि संसाधनों से समृद्ध देश इराक बर्बाद हो गया।


तेल बेच कर मुनाफा कमाने का ट्रम्प का बयान भी चर्चा में है। बेशक बस ड्राइवर से वर्कर्स यूनियन नेता और फिर वेनेजुएला के राष्ट्रपति बनने वाले मादुरो संत नहीं हैं, पर अपना नेता और नियति चुनने का अधिकार तो सिर्फ वेनेजुएला के नागरिकों को  होना चाहिए। ट्रम्प के पहले कार्यकाल से ही मादुरो अमरीका के निशाने पर रहे हैं। 2020 में ही मादुरो और उनके करीबियों पर आतंकवाद, मादक पदार्थ तस्करी, मनी लांङ्क्षड्रग और भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए अमरीका ने गिरफ्तारी पर डेढ़ करोड़ डॉलर का ईनाम घोषित किया था। ट्रम्प के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने पर  ईनाम राशि बढ़ा कर 5 करोड़ कर दी गई। 


ट्रम्प के पूर्ववर्ती राष्ट्रपति भी दबंगई दिखाते रहे हैं, पर अपने-अपने हितों से प्रेरित अन्य देश विश्व व्यवस्था को दूरगामी आशंकित खतरे के प्रति उस कबूतर की तरह आचरण कर रहे हैं, जो बिल्ली को देख कर अपनी आंखें बंद कर खुद को सुरक्षित समझ लेता है। दूसरी बार राष्ट्रपति बनते ही ट्रम्प ने दुनिया में जो ‘टैरिफ वॉर’ छेड़ी, वह दबंगई का ही संकेत था, पर एकजुट हो कर प्रतिकार करने की बजाय देश अपने-अपने समझौते की राह खोजने में लगे रहे। 


वेनेजुएला की सुप्रीम कोर्ट ने उप राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज को अंतरिम राष्ट्रपति बनाया है, पर ट्रम्प अपनी खास टीम के जरिए वेनेजुएला को चलाना चाहते हैं। यह औपनिवेशिक सोच है, जिसका विरोध करने का ऐलान वेनेजुएला के नागरिकों ने किया है। वेनेजुएला का भविष्य उसके नागरिकों की संघर्ष क्षमता पर निर्भर करेगा लेकिन किसी संप्रभु देश पर इस तरह हमले पर शेष विश्व का मूकदर्शक बने रहना बड़े खतरे को मौन निमंत्रण साबित हो सकता है। क्यूबा, कोलम्बिया और मैक्सिको को भी ट्रम्प धमकी दे ही रहे हैं। ग्रीनलैंड में तो डर साफ नजर आने लगा है।-राज कुमार सिंह 

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328 पवित्र स्वरूपों के मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए

January 09, 2026


 श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के 328 पवित्र स्वरूपों के गायब होने का मुद्दा सिर्फ एक प्रशासकीय विवाद नहीं, बल्कि यह पंजाब की राजनीति, सिख समुदाय की एकता, एस.जी.पी.सी.  की साख और सरकार की नीयत के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। सिख धर्म में श्री गुरु ग्रंथ...


श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के 328 पवित्र स्वरूपों के गायब होने का मुद्दा सिर्फ एक प्रशासकीय विवाद नहीं, बल्कि यह पंजाब की राजनीति, सिख समुदाय की एकता, एस.जी.पी.सी.  की साख और सरकार की नीयत के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। सिख धर्म में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को सिर्फ एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक जीवित गुरु माना जाता है। इस वजह से पवित्र स्वरूपों का गायब होना सिख समुदाय के लिए गंभीर ङ्क्षचता का विषय है। इस मुद्दे ने सिख समुदाय में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर पवित्र स्वरूपों की देखभाल करने वाली संस्थाएं ही लापरवाह रहेंगी, तो पंथक रीति-रिवाजों और धार्मिक भावनाओं की रक्षा कैसे की जा सकेगी। यह मुद्दा आज नहीं उठा। अगर पीछे देखें, तो माना जाता है कि यह मामला 2013 से 2015 के बीच शुरू हुआ था और तब सामने आया, जब पंजाब मानवाधिकार संगठन ने 26 जून, 2020 को जत्थेदार श्री अकाल तख्त और पंजाब सरकार को एक चिट्ठी लिखी। इसके बाद एस.जी.पी.सी. के प्रिटिंग विभाग के एक कर्मचारी ने 29 जून, 2020 को शिरोमणि कमेटी को चिट्ठी लिखी।


कुछ समय बाद, 4 नवम्बर, 2020 को दरबार साहिब के पूर्व हजूरी रागी बलदेव सिंह वडाला के नेतृत्व में सद्भावना दल ने कानूनी कार्रवाई करने के लिए पक्का धरना शुरू किया और बाद में गुरवतन सिंह नाम के एक व्यक्ति ने 21 नवम्बर को एस.जी.पी.सी. और पंजाब सरकार को एक रिप्रैजैंटेशन दिया। 11 मार्च को गुरवतन सिंह ने एस.जी.पी.सी. और पंजाब सरकार को एक कानूनी नोटिस भेजा। दोनों संबंधित पक्षों द्वारा कार्रवाई न किए जाने के कारण, गुरवतन सिंह ने 12 अप्रैल को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर की। 28 अगस्त को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने इस आधार पर रिट का निपटारा कर दिया कि पंजाब गृह विभाग ने डी.जी.पी. पंजाब को उचित कार्रवाई करने के लिए लिखा था। लेकिन, इसके बाद भी कोई कार्रवाई न होने पर याचिकाकत्र्ता ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में अदालत की अवमानना की याचिका दायर की, जिस पर माननीय हाईकोर्ट ने 2 अक्तूबर को पंजाब के डी.जी.पी. के खिलाफ नोटिस जारी किया और अगली सुनवाई 16 दिसम्बर तय की।


2 अक्तूबर को जारी नोटिस की जवाबदेही का सामना करने से बचने के लिए, पंजाब पुलिस ने हाईकोर्ट द्वारा तय की गई 16 दिसम्बर की तारीख से कुछ दिन पहले 7 दिसम्बर को एस.जी.पी.सी. के 16 पूर्व कर्मचारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया और 2 लोगों को गिरफ्तार किया। लेकिन सालों तक मामले को आंतरिक जांच के जरिए निपटाने की कोशिश और जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक न करना, एस.जी.पी.सी. की पारदॢशता पर सवाल उठाता है। कई पार्टियों का मानना है कि अगर इस मामले को तुरंत पारदर्शी तरीके से सुलझा लिया गया होता, तो मौजूदा हालात से बचा जा सकता था। एस.जी.पी.सी. की प्रशासनिक क्षमता और जवाबदेही तथा पंजाब सरकार की प्रशासनिक कार्यकुशलता, दोनों पर कोई सवालिया निशान नहीं लगता।


यह मुद्दा मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार के लिए धर्म और कानून के बीच बैलेंस बनाए रखने की एक बड़ी चुनौती बन गया है। हालांकि सरकार का कहना है कि कानून सबके लिए एक जैसा है और धार्मिक संस्थाएं भी इससे ऊपर नहीं हैं, फिर भी सरकार पर इस मामले को धर्म में दखल के तौर पर न देखने का दबाव है। सरकार के लिए चुनौती यह है कि किसी भी कार्रवाई के दौरान पंथक भावनाओं को ठेस न पहुंचे। पवित्र निशानियों के गायब होने का मुद्दा सिख संस्थाओं और सरकार के लिए जिम्मेदारी का सबक है और सवाल यह उठ रहा है कि क्या एस.जी.पी.सी. और पंजाब सरकार जैसी संस्थाएं अपनी जवाबदेही पक्का करेंगी या नहीं। दोनों ही पक्ष इस मुद्दे पर लोगों का भरोसा जीतने में कामयाब होते नहीं दिख रहे। एस.जी.पी.सी. न तो समय पर काम पूरा कर पाई और न ही अपने लिए गए फैसलों पर कायम रह पाई। दूसरी तरफ, सरकार आम जनता को यह भरोसा दिलाने में भी नाकाम रही है कि वह कानूनी और धार्मिक समझदारी के लिए काम कर रही है। इस मुद्दे पर सरकार का लंबे समय तक चुप रहना और हाईकोर्ट के नोटिस के बाद ही कार्रवाई करना और स्पीकर तथा शिक्षा मंत्री द्वारा एफ.आई.आर. की कॉपी प्रदर्शनकारियों को सौंपना भी सरकार की निष्पक्ष सोच पर सवाल खड़े करता है। जांचों, अंदरूनी रिपोर्टों और हाईकोर्ट के आदेशों, एस.आई.टी. बनाने और गिरफ्तारियों के बावजूद अभी तक 328 पवित्र स्वरूपों का पता नहीं चला है और अब शिरोमणि कमेटी भी कह रही है कि एस.जी.पी.सी. के पास 328 पवित्र स्वरूपों का हिसाब नहीं है। एस.जी.पी.सी. ने भी एस.आई.टी. को दस्तावेज देने से साफ मना कर दिया है।


इसके अलावा, इस मुद्दे को लेकर एक पत्रकार द्वारा अपने चैनल पर जारी ऑडियो, बंटी रोमाना का सरकार पर अपने शपथ पत्र से पलटने का आरोप और पंजाब के स्पीकर के अकाल तख्त के जत्थेदार के बारे में बयान ने इस मुद्दे को धार्मिक से ज्यादा राजनीतिक बना दिया है, जिसकी वजह से यह मुद्दा अभी भी अनसुलझा और गंभीर बना हुआ है। इसलिए एस.जी.पी.सी. और पंजाब सरकार को राजनीति से ऊपर उठकर इस मुद्दे को सुलझाने के लिए कार्रवाई करने की जरूरत है। नहीं तो, भविष्य में इसके नतीजे एस.जी.पी.सी., पंथक संगठनों और मान सरकार पर दूरगामी असर डालेंगे, जो किसी के भी हित में नहीं होगा।-इकबाल सिंह चन्नी

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पर्वों का संगम : जीवन में सहज-सजग शुरुआत का आनंद

January 08, 2026

 


नववर्ष  जब लोहड़ी और मकर संक्रांति के साथ दस्तक देता है, तो समय मानो एक क्षण ठहरकर हमें कुछ याद दिलाने आता है। आंगनों में जलती लोहड़ी की अग्नि, अन्न की सांझेदारी, सूर्य का उत्तरायण होना-ये केवल पर्व नहीं, जीवन के संतुलन के संकेत हैं। यह संयोग हमें...


नववर्ष जब लोहड़ी और मकर संक्रांति के साथ दस्तक देता है, तो समय मानो एक क्षण ठहरकर हमें कुछ याद दिलाने आता है। आंगनों में जलती लोहड़ी की अग्नि, अन्न की सांझेदारी, सूर्य का उत्तरायण होना-ये केवल पर्व नहीं, जीवन के संतुलन के संकेत हैं। यह संयोग हमें बताता है कि जीवन में सच्ची शुरुआत कभी हड़बड़ी से नहीं होती, वह हमेशा लय और सजगता से जन्म लेती है। नया साल हमसे तेज दौडऩे की मांग नहीं करता। वह हमसे सजग होकर मंजिल तक पहुंचने को प्रेरित करता है। लेकिन हर जनवरी के साथ हमारे मन में एक अजीब-सी बेचैनी घर कर जाती है-और बेहतर, और तेज, और अधिक साबित करने की होड़ में हड़बड़ी। लक्ष्य ऊंचे करने, टाइम-टेबल ठूंसने और साल के शुरुआती दिनों में ही उपलब्धियां दिखाने का दबाव। जैसे समय स्वयं हमसे हिसाब मांग रहा हो। जबकि सच्ची शुरुआत कभी दबाव में नहीं होती। वह तब होती है, जब हड़बड़ी की जगह सजगता हो, जब गति से पहले संतुलन बनाया जाए। 


आज की अधिकांश महत्वाकांक्षाएं प्रेरणा से नहीं, तुलना से जन्म लेती हैं। हम उधार की समय-सीमाओं और परिभाषाओं में सफलता को नापने लगे हैं। ऐसी परिभाषाएं, जो हमारे जीवन के भीतर की ऋतु, लय और सीमा को शायद ही मानती हों। नतीजा यह है कि जनवरी के अंत में ही बहुत से लोग थक चुके होते हैं। यह थकान अनुशासन की कमी नहीं, सुनने व समझने की कमी का परिणाम है। यह असफलता नहीं, असंतुलन है। कर्म समस्या नहीं है। बिना भीतर टिके किया गया कर्म ही कई बार संकट का रूप ले लेता है। सजगता रहित महत्वाकांक्षा शोर बन जाती है। वह आगे तो धकेलती है, पर यह नहीं पूछती कि दिशा सही है या नहीं। सजगता महत्वाकांक्षा को समाप्त नहीं करती, बल्कि उसे शुद्ध करती है।


पर्वों में छिपा जीवन-विज्ञान : भारत के फसल पर्व इसी समय आते हैं-यह संयोग नहीं, संकेत है। ये पर्व हमें बिना उपदेश दिए सिखाते हैं कि जीवन केवल महत्वाकांक्षा से नहीं, संतुलन से चलता है। अग्नि शुद्ध करती है। भोजन पोषण देता है और संतुलन उपचार करता है। जब हम अग्नि को कृतज्ञता से, भोजन को संयम से और शरीर को लय से सम्मान देते हैं, तो मन स्वत: स्थिर होने लगता है। ये पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य की गहरी समझ हैं। लोहड़ी हमें सिखाती है कि जो पक चुका है, जो भारी हो गया है, उसे छोड़ देना चाहिए। मकर संक्रांति का संदेश है कि रोशनी की ओर मुडऩा अचानक नहीं, धीरे.धीरे होता है। दोनों मिलकर एक शाश्वत सत्य कहते हैं-विकास कठोर होना जरूरी नहीं। परिवर्तन जल्दबाजी में नहीं होता और सजग प्रगति अंतत: शांति बन जाती है। सजगता को अक्सर जीवन से पलायन समझ लिया जाता है। जबकि सच यह है कि सजगता जीवन से सबसे गहरा संवाद है। अपनी सांस, थकान और इच्छा को बिना जजमैंट देख पाना-यह आत्मिक ईमानदारी है और वही साहस है। आधुनिक विज्ञान भी अब मानता है कि जब कर्म विवशता से नहीं, सजगता से उपजता है, तो मन स्थिर होता है, प्रतिक्रियाएं नरम पड़ती हैं और स्पष्टता जन्म लेती है।


सहज शुरुआत धीमी इसलिए नहीं होती कि उसमें ऊर्जा कम है, बल्कि इसलिए कि उसमें दिशा का सम्मान होता है। जब हम नया साल सजगता से शुरू करते हैं, तो सवाल बदल जाते हैं। ‘मैं कितना हासिल कर सकता हूं’ की जगह ‘क्या आवश्यक है’ सामने आता है। सहजता कमजोरी नहीं है। वह बिना हिंसा की शक्ति है। आज की थकान शारीरिक से अधिक मानसिक है। कठोर आत्मसंवाद, अवास्तविक अपेक्षाएं और निरंतर स्वयं पर निगरानी-इनमें कोई भी जीवित तंत्र फलता-फूलता नहीं। श्रीमद् भगवत गीता यहां भी करुणा से मार्ग दिखाती है-‘उद्धरेदात्मनाऽत्मानं’ अर्थात स्वयं को स्वयं उठाओ, गिराओ मत। जैसे बीज केवल कोमल मिट्टी में फूटता है, वैसे ही भीतर का परिवर्तन सुरक्षा और करुणा में होता है।


सफलता की नई परिभाषा : ‘बर्नआऊट’, चिंता और भावनात्मक दूरी व्यक्तिगत असफलता नहीं, सामूहिक संकेत हैं। ये बताते हैं कि हमारी सफलता की मौजूदा परिभाषा मानव स्वभाव से मेल नहीं खा रही। उपस्थिति के बिना उत्पादकता खोखली है। भीतर के आधार के बिना उपलब्धि टिकती नहीं। सजगता को चुनना लक्ष्य छोडऩा नहीं है। यह लक्ष्य को भय की जगह स्पष्टता से आगे बढऩे देना है।


नववर्ष और लोहड़ी-मकर संक्रांति (उत्तरायण) के इस संगम पर शायद सबसे बड़ा संकल्प यह हो सकता है कि हम समय को जीतने नहीं, समझने की कोशिश करें। बोलने से पहले देखें। तय करने से पहले सुनें। आगे बढ़ें, पर भीतर आक्रामकता के बिना। सहज शुरुआत अनिर्णय नहीं, चलती हुई बुद्धि है। इस राह पर हम पीछे नहीं छूटते। हम पहुंचते हैं, जड़ में टिके, उपस्थित और शांत आत्मविश्वास के साथ। सहजता हमसे ताकतवर बनने को नहीं कहती, वह हमें सच्चा बनने को कहती है। नव वर्ष, लोहड़ी-मकर संक्रांति (उत्तरी भारत), पोंगल (दक्षिणी भारत), उत्तरायण (गुजरात, राजस्थान), माघ बिहू (असम), मकर विलक्कू (केरल) का संगम हमें सहजता व सजगता से जीवन को आगे बढ़ाने का संदेश देता है।(लेखिका स्प्रिचुअल-लाइफस्टाइल मैंटर एवं ‘अमृतम’ की संस्थापक हैं)-संगीता मित्तल

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स्वास्थ्य सेवाओं में गुणवत्ता की नई इबारत: भारत ने पार किया 50 हज़ार NQAS प्रमाणन का ऐतिहासिक पड़ाव

January 08, 2026

 


आज़ादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर भारत ने सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की है। देश भर में अब तक 50,373 सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों को राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानक (NQAS) के तहत प्रमाणित किया जा चुका है। यह उपलब्धि भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र में गुणवत्ता, सुरक्षा और रोगी-केंद्रित देखभाल को सशक्त बनाने की दिशा में एक अहम मील का पत्थर मानी जा रही है।


स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा स्थापित NQAS फ्रेमवर्क के अंतर्गत यह लक्ष्य 31 दिसंबर 2025 तक देश के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में हासिल किया गया। यह उपलब्धि केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि उस बदलाव की कहानी है जो आज देश के ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी क्षेत्रों तक सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में साफ दिखाई दे रहा है।


10 अस्पतालों से 50 हज़ार तक का सफर


NQAS की शुरुआत वर्ष 2015 में मात्र 10 जिला अस्पतालों के साथ हुई थी। इसका उद्देश्य सरकारी अस्पतालों में सुरक्षित, स्वच्छ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं को सुनिश्चित करना था। समय के साथ इस पहल का विस्तार उप-जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, आयुष्मान आरोग्य मंदिर–प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और उप-स्वास्थ्य केंद्रों तक किया गया, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता हर स्तर पर सुदृढ़ हो सके।


वर्चुअल असेसमेंट से मिली तेज़ रफ्तार

गुणवत्ता प्रमाणन की इस तेज़ प्रगति में वर्चुअल असेसमेंट की अहम भूमिका रही। दिसंबर 2023 में जहाँ केवल 6,506 स्वास्थ्य संस्थान NQAS प्रमाणित थे, वहीं दिसंबर 2024 में यह संख्या बढ़कर 22,786 हो गई। इसके बाद महज़ एक वर्ष में यह आँकड़ा 50,373 तक पहुँच गया। इनमें 48,663 आयुष्मान आरोग्य मंदिर और 1,710 माध्यमिक स्तर के अस्पताल शामिल हैं।


सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की दिशा में मजबूत कदम

यह उपलब्धि भारत की सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की प्रतिबद्धता को भी मज़बूती प्रदान करती है, जिसका लक्ष्य हर नागरिक को बिना आर्थिक बोझ के सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराना है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के तहत क्षमता निर्माण, डिजिटल नवाचार, प्रशिक्षित मूल्यांकनकर्ताओं की संख्या में वृद्धि और सतत गुणवत्ता सुधार जैसे बहुआयामी प्रयासों से यह संभव हो सका है।


आत्मनिर्भर भारत की भावना का प्रतीक


50 हज़ार NQAS प्रमाणन का यह ऐतिहासिक पड़ाव आत्मनिर्भर भारत की भावना और “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास” के संकल्प को साकार करता है। यह दर्शाता है कि भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र अब न केवल विस्तार कर रहा है, बल्कि वैश्विक गुणवत्ता मानकों के अनुरूप भी विकसित हो रहा है।


आगे का लक्ष्य


सरकार ने आने वाले समय के लिए भी स्पष्ट रोडमैप तैयार किया है। मार्च 2026 तक देश के कम से कम 50 प्रतिशत सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों को NQAS प्रमाणन देने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि गुणवत्ता, सुरक्षा और मरीज-केंद्रित देखभाल सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की स्थायी पहचान बन सके

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‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ का वैश्विक प्रभाव और भारत की दुविधा

January 06, 2026

 


अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प 20 जनवरी को अपने दूसरे कार्यकाल का एक वर्ष पूरा करेंगे। ‘द इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका का कहना है कि उन्होंने ‘घरेलू और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को पूरी तरह से उलट दिया है।’ चुनाव प्रचार के दौरान, उन्होंने रूढि़वादी हैरिटेज फाऊंडेशन द्वारा निर्मित प्रोजैक्ट 2025 को नजरअंदाज कर दिया था। हालांकि, पदभार ग्रहण करने के बाद उनके कार्यकारी आदेशों की झड़ी ने प्रोजैक्ट 2025 को लागू करना शुरू कर दिया। इसमें बिना सुनवाई के संदिग्ध विदेशियों का बड़े पैमाने पर जबरन निर्वासन, घरेलू सैन्य हस्तक्षेप (जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने रोक दिया है)।


अप्रैल में ‘स्वतंत्रता दिवस’ के अवसर पर आयात पर मनमाने टैरिफ लगाने के साथ ही बाह्य नीति में बदलाव शुरू हुए। इसके बाद इसराईल के साथ घनिष्ठ संबंध, यूक्रेन युद्ध से निपटने में रूस समर्थक झुकाव, चीन के साथ व्यापारिक गतिरोध में वृद्धि और एक अस्थायी समझौता हुआ। 4-5 दिसम्बर की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (एन.एस.एस.) ने अमरीकी नीति में हुए प्रमुख परिवर्तनों की पुष्टि की। नई विदेश नीति की प्राथमिकताओं में ‘पश्चिमी गोलाद्र्ध’ को सबसे ऊपर रखा गया है। इसमें उत्तरी और दक्षिणी अमरीका का जिक्र है, जो 19वीं सदी के मोनरो सिद्धांत को पुनर्जीवित करता है, जिसने यूरोपीय प्रतिद्वंद्वियों को लैटिन अमरीकी मामलों में हस्तक्षेप करने से रोका था। इसके बाद एशिया का स्थान आता है, जिसमें इंडो-पैसिफिक पर विशेष ध्यान दिया गया है। पिछले एन.एस.एस. दस्तावेजों के विपरीत, चीन को खतरे के रूप में नामित नहीं किया गया है। 8 दिसम्बर को, अमरीका ने एनवीडिया के उन्नत एच-200 चिप्स की चीन को बिक्री की अनुमति दी। भारत एक अप्रत्यक्ष संदर्भ के रूप में सामने आता है, जिससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद की उम्मीद की जाती है। 


1945 के बाद की अस्त-व्यस्त वैश्विक व्यवस्था में, भारत की क्या भूमिका है? भाजपा ने दक्षिण एशिया को छोड़कर घरेलू राजनीति को विदेश नीति से काफी हद तक अलग रखने में कामयाबी हासिल की। घरेलू स्तर पर राष्ट्रवादी-बहुसंख्यकवादी राजनीति अपनाते हुए, धर्म और राजनीति के बीच की सीमाओं को मिटाते हुए, उसकी विदेश नीति कम से कम सतही तौर पर पुरानी धर्मनिरपेक्षता की राह पर चलती रही। भारत में मानवाधिकार प्रथाओं पर अमरीकी विदेश विभाग की रिपोर्टों ने धार्मिक, व्यक्तिगत और प्रैस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध की कड़ी आलोचना की। 2024 की रिपोर्ट में नागरिकता संशोधन अधिनियम और धर्मांतरण विरोधी कानूनों को चिंताजनक बताया गया। हालांकि, इसने भाजपा के गैर-उदारवादी राजनीतिक मार्ग को नजरअंदाज कर दिया, जिससे लोकतंत्र कमजोर हो रहा था। भारत-अमरीका संबंधों को वैश्विक अमरीकी रणनीति के लिए अधिक महत्वपूर्ण माना गया।


घरेलू स्तर पर, अमरीका में बढ़ती विदेशियों के प्रति नफरत भारतीय प्रवासी समुदाय, विशेष रूप से उनकी धार्मिक प्रथाओं को प्रभावित कर रही है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने अगस्त में हुई 2 दुर्घटनाओं के बाद अमरीका में सिख ट्रक चालकों की परेशानियों के बारे में लिखा। ट्रक व्यवसाय में लगे सिखों की संख्या 1,50,000 है, जिनमें से कई शरणार्थी वीजा पर हैं, जो संभवत: सिख प्रवासी समुदाय का एक-चौथाई हिस्सा है। संघीय अधिकारियों ने कैलिफोर्निया जैसे राज्यों से अपनी ड्राइविंग लाइसैंस नीति की समीक्षा करने को कहा है। 


ईसाई भाषी और पश्चिमी देशों में बढ़ती विदेशियों के प्रति नफरत चिंता का विषय है। भाजपा निश्चित रूप से यह समझती है कि भारत में हिंदू समूहों द्वारा ईसाइयों को निशाना बनाना, विशेष रूप से इस वर्ष, हिंदू प्रवासी समुदाय के खिलाफ प्रतिशोध को भड़का सकता है। मुसलमानों की छिटपुट लिंचिंग ने इस्लामी दुनिया के साथ भारत के संबंधों को प्रभावित नहीं किया क्योंकि मोदी सरकार ने खाड़ी के प्रमुख शासक परिवारों के साथ सफलतापूर्वक बातचीत की थी लेकिन ट्रम्प को लुभाने और सऊदी अरब तथा यू.ए.ई. के साथ संबंध मजबूत करने के बाद पाकिस्तान कूटनीतिक रूप से पुनर्जीवित हो गया है। अब वह भारत को चुनौती देने के लिए बेहतर स्थिति में है।-के.सी. सिंह(ईरान और यू.ए.ई. में पूर्व राजदूत)

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युवाओं की थाली में खिचड़ी

January 06, 2026

 


आमतौर पर खिचड़ी के बारे में कहा जाता है कि उसे बीमार लोग खाते हैं। वह पचने में आसान होती है और ऊर्जा से भरपूर भी। स्वास्थ्य के लिए भी इसे अच्छा माना जाता है। हालांकि यह सिर्फ बीमार का खाना ही नहीं है। मुम्बई की मशहूर डाइटीशियन रुजता दिवेकर कहती हैं कि अपने रात के खाने में खिचड़ी को जरूर शामिल करें। इसमें देसी घी जरूर डालें। वह पेट की बीमारियों से जूझते गम्भीर रोगियों को इसे जरूर खाने की सलाह देती हैं। मशहूर अभिनेत्री करीना कपूर ने भी एक बार कहा था कि सप्ताह में कई दिन शाम को वह कटोरा भरकर खिचड़ी खाती हैं। उनके पति सैफ को भी यह बहुत पसंद है। उत्तर भारत में खिचड़ी के बारे में एक कहावत चलती है-खिचड़ी के चार यार, घी, पापड़, दही, अचार। हालांकि उत्तर भारत में रात को दही या छाछ खाने की मनाही होती है। इन्हें रात में खाने से गैस और जोड़ों में दर्द हो सकता है, ऐसा कहा जाता है। इसीलिए इन्हें नहीं खाया जाता। 


खैर इस बार नए साल की पूर्व संध्या पर बेंगलुरु के बारे में एक दिलचस्प खबर सामने आई। आपको पता ही होगा कि बेंगलुरु को भारत की सिलिकॉन वैली कहा जाता है। आई.टी. में यहां असंख्य युवा काम करते हैं। इस बार उनमें से बहुतों ने नए साल का जश्न घर से बाहर नहीं, बल्कि घर के अंदर रहकर ही मनाया। यह एक चौंकाने वाली बात भी थी। 9410 लोगों ने रात के खाने के लिए किसी जंक फूड के मुकाबले खिचड़ी को चुना। 4244 लोगों ने उपमा मंगाई और 1927 लोगों ने सलाद मंगाया। ये सारी जानकारियां स्विगी के एक्स अकाऊंट से दी गई हैं। यह भी कहा गया कि ये लोग पार्टी करने की बजाय, रात के 10 बजे तक सो भी जाएंगे।  यह जानकारी मात्र एक शहर के बारे में है। हो सकता है कि बाकी शहरों के आंकड़े बाद में सामने आएं।  इन आंकड़ों को जानकर लगता है कि क्या हमारे युवा अब जंक के मुकाबले स्वाथ्य वर्धक भोजन में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं? हो सकता है कि उन्होंने रुजता और करीना के वीडियोज देखे हों। रुजता का तो यह भी कहना है कि भोजन में घी को अवश्य शामिल करें। रोटी बिना घी के न खाएं। अर्से तक घी को मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बताया जाता रहा है। इसे कोलैस्ट्रोल बढ़ाने के लिए जिम्मेदार माना जाता है। 


जबकि एक बहुत मशहूर वजन घटाने वाली चेन के दफ्तर के बाहर में इस लेखिका ने देखा था कि वहां एक बोर्ड पर मोटे अक्षरों में लिखा था कि रिफाइंड तेल न खाएं। इनमें 99 प्रतिशत कैलोरीज होती हैं। एक जमाने तक हार्श मार्कीटिंग के जरिए इन तेलों को न केवल स्वास्थ्यवर्धक बल्कि जीरो कैलोरी वाला बताया जाता रहा है। किसी क्लीनीकल ट्रायल में इनकी उपयोगिता साबित हुई हो, ऐसी भी जानकारी इस लेखिका को नहीं है। लेकिन अब इन्हें खाने से मना किया जा रहा है। बहुत से स्वास्थ्य विशेषज्ञ यहां तक कह रहे हैं कि कुछ मात्रा में घी को तो हृदय रोगी भी खा सकते हैं। यह कोलैस्ट्रोल भी नहीं बढ़ाता। एक डाक्टर ने ही इस लेखिका से कहा था कि अगर घी को खुली हथेली पर रखो, तब भी वह पिघल जाता है, ऐसे में शरीर की गर्मी के कारण, वह शरीर के अंदर कैसे जम सकता है। यूं भी आज से 50 साल पहले घी के बिना गेहूं, मक्का, बाजरा की रोटी खाना वॢजत माना जाता था। लेकिन अब ऐसा लगता है कि घी जैसा खलनायक वापस आ रहा है। उसके दिन बहुर गए हैं। जिसे रसोई से विदा कर दिया गया था, अब आदरपूर्वक उसे फिर जगह मिल रही है। वैसे भी घी आमतौर पर उद्योग का हिस्सा नहीं रहा, घरों में ही बनाया जाता रहा है। हमारे कृषि समाज में घर-घर गाय, भैंस पाली जाती रही हैं और दूध से बनाए जाने वाले उत्पाद घर में ही बनते रहे हैं। भगवान कृष्ण की सारी कथाएं माखन से ही जुड़ी रही हैं।


अब घी बाजार में भी मिलता है। हालांकि यह भी सच है कि बाजार में मिलने वाले अधिकांश घी की शुद्धता की कोई गारंटी भी नहीं है। लेकिन किया भी क्या जाए। घर में कौन घी बनाए। जो स्त्री 24 & 7 की नौकरी करती हो, उसके पास खाना बनाने का समय ही नहीं है। जो खाना बनाती हैं, बच्चों और परिवार की देखभाल करती हैं, उनकी आफतों के कहने ही क्या। तब स्वास्थ्य कैसे बचे। शायद इसी तरह कि जब बहुत से लोग जंक खा रहे हों, तब खिचड़ी खा ली जाए, उपमा या सलाद। यूं भी खिचड़ी अनेक तरह से बन सकती है। अधिकांश दालों और चावलों को मिलाकर बनाई जा सकती है। सब्जियां भी डाली जा सकती हैं। साबूदाने और बाजरे की खिचड़ी भी खाई जा सकती है। 9000 से अधिक लोगों ने किस दाल की खिचड़ी खाई थी, यह तो पता नहीं लेकिन खिचड़ी खाना समाचार बना, यह एक अनोखी बात है। बीमार की थाली से निकलकर, खिचड़ी किसी उत्सव के दिन भोजन का हिस्सा बन रही हो, हजारों लोग उसे खा रहे हों, यह एक दिलचस्प बात है।-क्षमा शर्मा



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अभयरैब वैक्सीन पर IIL का पक्ष, ऑस्ट्रेलियाई चेतावनी को बताया भ्रामक

January 03, 2026

 


भारत की अग्रणी वैक्सीन निर्माता कंपनियों में से एक इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स लिमिटेड (IIL) ने मानव एंटी-रेबीज वैक्सीन ‘अभयरैब’ को लेकर सामने आई हालिया खबरों पर शनिवार को स्पष्टीकरण जारी किया है। कंपनी ने ऑस्ट्रेलियाई स्वास्थ्य एजेंसियों की ओर से जारी परामर्श को अत्यधिक सतर्कता भरा और भ्रामक बताते हुए सख्ती से खारिज किया है।

कंपनी के अनुसार, यह नकली बैच अब बाजार में उपलब्ध नहीं है और इसे तुरंत वापस ले लिया गया था

IIL ने अपने बयान में कहा कि अभयरैब रेबीज वैक्सीन के जिस कथित नकली बैच बैच नंबर KA24014 (निर्माण तिथि मार्च 2024, समाप्ति तिथि फरवरी 2027) का उल्लेख किया जा रहा है, उसकी पहचान जनवरी 2025 की शुरुआत में ही कर ली गई थी। कंपनी के अनुसार, यह नकली बैच अब बाजार में उपलब्ध नहीं है और इसे तुरंत वापस ले लिया गया था।

एडवाइजरी में कहा गया कि 1 नवंबर 2023 के बाद अभयरैब वैक्सीन पाने वाले ऑस्ट्रेलियाई यात्रियों को नया टीकाकरण शुरू करना चाहिए

इससे पहले इसी सप्ताह ऑस्ट्रेलियन टेक्निकल एडवाइजरी ग्रुप ऑन इम्यूनाइजेशन (ATAGI) ने चेतावनी जारी करते हुए दावा किया था कि 1 नवंबर 2023 से भारत में अभयरैब वैक्सीन के नकली बैच प्रचलन में हैं। एडवाइजरी में यह भी कहा गया था कि 1 नवंबर 2023 के बाद भारत में जिन ऑस्ट्रेलियाई यात्रियों को अभयरैब वैक्सीन लगाई गई है, उन्हें उस टीकाकरण को अमान्य मानते हुए नया कोर्स शुरू करना चाहिए।

कंपनी ने बताया कि 2000 से अभयरैब वैक्सीन का निर्माण हो रहा है और 40 देशों में 21 करोड़ से अधिक खुराकें दी गई हैं

रेबीज एक वायरल ज़ूनोटिक बीमारी है, जो केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है। लक्षण सामने आने के बाद यह लगभग हमेशा जानलेवा होती है, हालांकि समय पर चिकित्सा हस्तक्षेप से इससे बचाव संभव है।कंपनी ने बताया कि अभयरैब वैक्सीन का निर्माण वर्ष 2000 से किया जा रहा है और अब तक भारत समेत 40 से अधिक देशों में 21 करोड़ से ज्यादा खुराकों की आपूर्ति की जा चुकी है। वर्तमान में भारत में इस वैक्सीन की बाजार हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है।

IIL ने कहा कि जनवरी 2025 में पैकेजिंग असामान्यता पर तुरंत अधिकारियों को सूचित कर कार्रवाई सुनिश्चित की गई

IIL ने कहा, “जनवरी 2025 में एक विशेष बैच में पैकेजिंग से जुड़ी असामान्यता की पहचान होते ही कंपनी ने तत्काल भारतीय नियामक संस्थाओं और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को सूचित किया। इसके साथ ही औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई और संबंधित अधिकारियों के साथ मिलकर त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की गई।” कंपनी ने स्पष्ट किया कि यह एक अलग-थलग घटना है।

IIL ने कहा कि भारत में हर वैक्सीन बैच को उपयोग से पहले केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला द्वारा जांच और मंजूरी मिलती है

स्वास्थ्य कर्मियों और आम जनता को आश्वस्त करते हुए IIL ने कहा कि भारत में निर्मित वैक्सीन के प्रत्येक बैच को बिक्री या उपयोग से पहले केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला (सेंट्रल ड्रग्स लेबोरेटरी), भारत सरकार द्वारा जांच और स्वीकृति दी जाती है। IIL में क्वालिटी मैनेजमेंट के वाइस प्रेसिडेंट एवं प्रमुख सुनील तिवारी ने कहा, “सरकारी संस्थानों और अधिकृत वितरकों के माध्यम से की गई सभी आपूर्तियां पूरी तरह सुरक्षित और मानक गुणवत्ता की हैं।”

IIL ने बताया कि अभयरैब WHO-GMP मानकों वाली शुद्ध सेल-कल्चर रेबीज वैक्सीन है, प्री व पोस्ट एक्सपोज़र में उपयोगी

कंपनी ने ऑस्ट्रेलियन टेक्निकल एडवाइजरी ग्रुप ऑन इम्यूनाइजेशन को लिखे पत्र में यह भी स्पष्ट किया है कि अभयरैब एक शुद्ध सेल-कल्चर आधारित रेबीज वैक्सीन है, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिसेज़ (GMP) सहित सभी लागू नियामक मानकों के अनुरूप तैयार किया जाता है। यह वैक्सीन रेबीज से बचाव के लिए प्री-एक्सपोज़र और पोस्ट-एक्सपोज़र दोनों स्थितियों में उपयोग की जाती है।

CDC ने भारत और हैती से लौटे यात्रियों में रेबीज मामलों पर स्वास्थ्य चेतावनी जारी कर पशुओं से दूरी की सलाह दी

इस बीच, इसी महीने की शुरुआत में सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) ने भी भारत और हैती के लिए स्वास्थ्य चेतावनी जारी की थी, जब इन देशों से लौटे यात्रियों में रेबीज की पुष्टि हुई थी। CDC ने अपनी एडवाइजरी में यात्रियों को कुत्तों, बिल्लियों और जंगली स्तनधारियों के संपर्क से बचने की सलाह दी है।

अभयरैब वैक्सीन पर IIL का पक्ष, ऑस्ट्रेलियाई चेतावनी को बताया भ्रामक अभयरैब वैक्सीन पर IIL का पक्ष, ऑस्ट्रेलियाई चेतावनी को बताया भ्रामक Reviewed by SBR on January 03, 2026 Rating: 5

कांग्रेस का पतन केंद्रीकरण और छूटे अवसरों की कहानी

January 03, 2026

 


बिहार विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार और शीतकालीन सत्र के दौरान संसद में प्रियंका गांधी के शानदार प्रदर्शन पर प्रतिक्रिया देते हुए, कई राजनीतिक विश्लेषक और कांग्रेस पार्टी के सदस्य एक बार फिर राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं। श्री गांधी ने अपनी भारत जोड़ो यात्रा से जो राजनीतिक प्रभाव हासिल किया था, वह अब लुप्त होता दिख रहा है। एक और यात्रा की चर्चा चल रही है, शायद उनकी छवि और राजनीतिक अपील को बनाए रखने के लिए। हालांकि, पार्टी की दयनीय स्थिति के लिए केवल श्री गांधी को दोष देना अनुचित होगा। यूरोपीय उपनिवेशवाद से भारत की स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व करने वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 1969 में औपचारिक रूप से विभाजित हो गई। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने अपनी काल्पनिक आत्मकथा ‘द इनसाइडर’ में अपने एक पात्र के माध्यम से कहा है कि ‘‘पार्टी एक स्वामित्व वाली संस्था बन गई थी’’। पुस्तक में यह टिप्पणी आपातकाल के समय के आसपास की है। प्रधानमंत्री कार्यालय और परिवार के भीतर राजनीतिक सत्ता के केंद्रीकरण के कारण, जिसमें मुख्यमंत्रियों को केवल रबर स्टैंप बनकर रह जाने का दर्जा प्राप्त हो गया था, ने मिलकर पार्टी के संगठनात्मक पतन में योगदान दिया था।


1980 के दशक में पार्टी का थोड़े समय के लिए पुनरुत्थान हुआ, लेकिन यह केंद्रीकृत मॉडल पर आधारित था। इंदिरा गांधी ‘भारत’ बन गईं। इसके बाद हुए पतन को राजनीतिक विश्लेषकों ने बखूबी दर्ज किया है। राव के प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान, उन्होंने पार्टी संगठन को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया और कांग्रेस कार्य समिति के चुनाव कराए, लेकिन यह एक असफल प्रयोग साबित हुआ। हालांकि, अगर 1990 के दशक में देश भर में कांग्रेस का नेतृत्व एकजुट होकर पार्टी का जमीनी स्तर से पुनॢनर्माण करता, तो उसके पास एक सामान्य, मुख्यधारा की अखिल भारतीय राजनीतिक पार्टी के रूप में खुद को फिर से स्थापित करने का अवसर था, जो किसी एक परिवार के करिश्मे पर निर्भर न हो। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसी शून्य का लाभ सोनिया गांधी और उनके आसपास के सत्ताधारी अभिजात वर्ग ने उठाया। भारतीय जनता पार्टी के उदय ने कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों और कम्युनिस्टों के साथ मिलकर 2004 में गठबंधन सरकार बनाने का अवसर दिया। सत्ता में वापसी के बाद, कांग्रेस पार्टी क्षेत्रीय नेताओं को सशक्त बनाकर राज्य स्तर पर अपने संगठन को पुनर्जीवित कर सकती थी। केवल वाई.एस. राजशेखर रैड्डी ही ऐसा कर पाए और अंतत: आंध्र प्रदेश में उनके द्वारा निर्मित पार्टी संगठन को दिल्ली नेतृत्व ने धोखा देकर त्याग दिया। अन्य क्षेत्रों में, कांग्रेस शरद पवार, ममता बनर्जी, वाई.एस. जगनमोहन रैड्डी और अन्य लोगों को फिर से इसके खेमे में लाकर संगठनात्मक रूप से पुनर्जीवित हो सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।


दूसरी ओर, कार्यकाल का उपयोग नेहरू-गांधी परिवार के नेतृत्व को और मजबूत करने के लिए किया गया। यह सर्वविदित था कि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी चाहती थीं कि उनका बेटा पार्टी की बागडोर संभाले। जहां कुछ नेताओं, जिनमें मुखर्जी प्रमुख थे, ने इस वंशवादी उत्तराधिकार का विरोध किया, वहीं अन्य, जिनमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह प्रमुख थे, ने इसे स्वीकार कर लिया। सितम्बर 2013 में, राहुल गांधी ने केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा पारित अध्यादेश को सार्वजनिक रूप से अस्वीकार करके प्रधानमंत्री पद के अधिकार को चुनौती दी थी। वाशिंगटन डी.सी. से घर लौटते समय सिंह ने इस्तीफा देने की बजाय मीडिया से कहा कि वह कांग्रेस पार्टी में कोई भी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं और राहुल गांधी के नेतृत्व में काम करने में उन्हें बहुत खुशी होगी।  फैसला हो चुका था। इस सोच पर सवाल उठाने वालों को दरकिनार कर दिया गया। पार्टी के क्षेत्रीय नेतृत्व पर 1969 के बाद एक ही व्यक्ति में राजनीतिक और संगठनात्मक शक्ति के केंद्रीकरण का असर पड़ा। 1998 में उस मॉडल पर वापस लौटने से पार्टी के आधार में और अधिक गिरावट आई। राहुल गांधी को यही क्षीण आधार विरासत में मिला।


भाजपा ने जब इस माहौल में एक संगठन और कार्यकत्र्ता-आधारित पार्टी के रूप में कदम रखा, तो एक दशक के भीतर ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे एक व्यक्ति-आधारित पार्टी में बदल दिया। भाजपा के भीतर क्षेत्रीय नेताओं को कमजोर कर दिया गया है, जबकि राजनीतिक रूप से कमजोर लोगों को सत्ता के पदों पर बिठा दिया गया है। यदि भाजपा इसी राह पर चलती रही, तो आर.एस.एस. से वर्तमान में मिल रहे समर्थन के बावजूद, संगठनात्मक रूप से उसका भी पतन होगा। व्यक्तित्व-आधारित राजनीति में प्रत्येक राजनेता अपने व्यक्तित्व को प्रदॢशत करके अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए प्रलोभित होता है। भाजपा के मुख्यमंत्री ऐसा करने से डरते हैं, क्योंकि मोदी ने शिवराज सिंह चौहान जैसे क्षेत्रीय नेताओं को हाशिए पर धकेल दिया है। वहीं, कांग्रेस पार्टी में राष्ट्रीय नेतृत्व की कमजोरी कर्नाटक में सिद्धारमैया और तेलंगाना में रेवंत रैड्डी जैसे क्षेत्रीय नेताओं को मुखर होने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। शशि थरूर, दिग्विजय सिंह, मनीष तिवारी, अश्वनी कुमार और पृथ्वीराज चव्हाण जैसे अन्य नेताओं का हाल ही में अधिक मुखर और सक्रिय होना भी इस बात का संकेत है कि इस केंद्रीकृत मॉडल को चुनौती देने का प्रयास किया जा रहा है। कांग्रेस में नेतृत्व का विकेंद्रीकरण उसके भविष्य के लिए शुभ सिद्ध होगा, ठीक उसी प्रकार जैसे भाजपा में केंद्रीकरण उसके पतन का कारण बन सकता है।-संजय बारू 

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‘जी राम जी’ तथा इसके विरोध के मायने

January 03, 2026

 


राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के हस्ताक्षर के साथ ‘जी राम जी’ या ‘विकसित भारत रोजगार गारंटी आजीविका मिशन ग्रामीण कार्यक्रम’ कानून का रूप लेकर लागू हो चुका है। हालांकि कांग्रेस पार्टी ने इसके विरुद्ध देशव्यापी विरोध अभियान की घोषणा की है। इस तरह अब राज्यों में मनरेगा की जगह जी राम जी के अंतर्गत योजनाएं चलेंगी, तो दूसरी ओर विपक्षी पार्टियों का विरोध भी होगा। सामान्य तौर पर यह स्वीकार किया जा सकता है कि कांग्रेस नेतृत्व वाली यू.पी.ए. सरकार में 2005 में नैशनल रूरल एम्प्लॉयमैंट गारंटी एक्ट या नरेगा कानून लागू किया गया था तो उसका इससे लगाव होगा। किंतु कोई कार्यक्रम बंद नहीं हो और उसकी जगह दूसरा आरंभ न हो सके ऐसी परम्परा न पहले थी और न आगे स्थापित हो सकती है। 


देश, काल और परिस्थिति के अनुसार ऐसी योजनाएं और कार्यक्रम बनते हैं तथा उनमें परिवर्तन आने के साथ योजनाएं संशोधित होती हैं, कुछ बंद होती हैं और कुछ बिल्कुल नई आरंभ भी होती हैं। विपक्ष इस कार्यक्रम से महात्मा गांधी नाम हटाने को आधार बनाकर विरोध को एक वैचारिक स्वरूप भी देने की कोशिश कर रहा है। हालांकि यू.पी.ए. सरकार ने भी इसमें महात्मा गांधी का नाम सन् 2009 में जोड़ा था। इसे इस रूप में भी कहा जा सकता है कि यू.पी.ए. सरकार की महात्मा गांधी के नाम पर अलग से कोई विशेष कार्यक्रम आरंभ करने की सोच नहीं थी, इसलिए पहले से जारी योजना में ही उनका नाम जोड़ दिया गया।  विपक्ष की ओर भी उंगली उठती है कि क्या उनका जी राम जी नाम से विरोध है? क्या कांग्रेस पार्टी और उन विपक्षी दलों को लगता है कि प्रभु राम का नाम जोडऩे से सरकारी कार्यक्रमों का सैक्युलर चरित्र समाप्त होता है? व्यक्तिगत बातचीत में आपको ऐसा करने वाले भी मिल जाएंगे। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से लेकर उनके पुत्र और कांग्रेस के साथी तमिलनाडु के द्रमुक आदि के सनातन और ङ्क्षहदुत्व के प्रति विचार और व्यवहार से हम-आप भली-भांति परिचित हैं। 


नरेगा और मनरेगा को बंद करने या इसमें बदलाव करने की मांग पुरानी है। इस कार्यक्रम ने कागजी खानापूॢत और भ्रष्टाचार के ऐसे कीॢतमान बनाए, जिनको किसी सूरत में रोक पाना मनरेगा के ढांचे में संभव नहीं हो पाया। इसके बाद इसके जारी रखने का कोई अर्थ नहीं था। केंद्र से लेकर राज्यों की कैग और अन्य रिपोर्ट, स्वतंत्र एन.जी.ओ. के अध्ययन तथा जमीन स्तर पर साफ दिख रहा था कि मनरेगा के नाम पर ज्यादातर खानापूॢत हो रही है। किसी कार्यक्रम को बंद करना उस महान व्यक्ति के प्रति धारणा का द्योतक नहीं हो सकता।  यह सामान्य समझ की बात है कि 2005 की जिन परिस्थितियों और पृष्ठभूमि में नरेगा आरंभ हुआ, उनमें आज अनेक मायनों में आमूल बदलाव आ गए हैं। दो दशक पहले नरेगा आरंभ होने के समय की ग्रामीण और समस्त भारत की आॢथक स्थिति में व्यापक अंतर आ चुका है। 2011-12 में 25.7 प्रतिशत के आसपास गरीब आबादी थी जबकि 2023-24 में यह 4.86 प्रतिशत रह गई है। तब और आज की गांव की स्थिति वैसी ही नहीं है। आज भारत 2047 तक विकसित देश का लक्ष्य बनाकर चल रहा है तो उसमें गांव और शहर से जुड़े सारे कार्यक्रम उस लक्ष्य के अनुरूप होने चाहिएं। 


जी राम जी में 4 मुख्य काम निर्धारित कर दिए गए हैं। जल से संबंधित कार्यों के माध्यम से जल सुरक्षा, मुख्य ग्रामीण आधारभूत संरचना, आजीविका से संबंधित संरचना और मौसमी घटनाओं के प्रभाव को कम करने वाले विशेष कार्य। इसमें बाढ़ और सुखे के प्रभावों को कम करने और निपटने के ढांचे भी शामिल हैं। आप देख सकते हैं कि जी राम जी का स्वरूप और संस्कार मनरेगा से बिल्कुल अलग है। इस कानून में ग्राम पंचायत द्वारा निर्मित विकसित ग्राम पंचायत योजना को अनिवार्य किया गया है। जैसा हम जानते हैं मिशन अमृत सरोवर के तहत 68,000 से ज्यादा जल निकाय बनाए गए हैं या पुनर्जीवित हुए हैं। इसमें खेती और भूजल की स्थिति में परिवर्तन आया है। जाहिर है इसे और शक्ति मिलेगी। जल संचयन बाढ़ निकासी और मृदा संरक्षण आदि काम होंगे तो गांव की आजीविका अपने आप सुरक्षित होगी। इसी तरह सड़कों और संपर्क सुविधाओं के साथ भंडारण, बाजार और उत्पादन से जुड़ी सुविधाएं बढ़ेंगी तो किसानों के लिए आय के साधन पैदा होंगे। अगर स्थायी टिकाऊ निर्माण हुए और उनसे रोजगार के अवसर बढ़े तो पलायन में कमी आएगी। 


सच कहें तो मनरेगा का नाम सुनकर अनेक किसान रोने लगते थे, गुस्से में आ जाते थे। इस कारण जहां मशीनों की आवश्यकता नहीं थी, वहां भी उनके उपयोग की विवशता पैदा हो गई। बुवाई, कटाई, निकायी आदि के लिए मशीन खरीदना सबके वश की बात भी नहीं रही थी।

अब कम से कम रबी और खरीफ के मुख्य मौसम में 60 दिनों तक राज्य मनरेगा को स्थगित कर सकते हैं। इससे खेती के लिए श्रमिकों की उपलब्धता की संभावना बढ़ेगी। कोई भी योजना शाश्वत नहीं हो सकती। अनुभव के आधार पर उनमें संशोधन-परिवर्तन होना चाहिए और जी राम जी भी इसका अपवाद नहीं हो सकता। भविष्य में परिस्थितियों के अनुरूप इससे परिवर्तित करने या इसमें संशोधन की स्थिति उत्पन्न होती है तो होगा।

‘जी राम जी’ तथा इसके विरोध के मायने ‘जी राम जी’ तथा इसके विरोध के मायने Reviewed by SBR on January 03, 2026 Rating: 5
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